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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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पंचम लम्बक ५८१ इसलिए अब तुम उसके पास जाकर उसका पेट फाड़कर लाओ। अब तुम्हें अपनी कही हुई सत्य बात से विचलित न होना चाहिए'॥१९० ॥ पत्नी के द्वारा इस प्रकार कहा गया शक्तिदेव प्रेम और दया से व्याकुल तथा प्रतिज्ञा से पराधीन होकर कुछ देर चुप रहा॥१९१॥ कुछ क्षण आवेश में आकर और वहाँ से निकलकर वह बिन्दुरेखा के पास गया। बिन्दु- रेखा ने उसे दुःखी और चिन्तित होकर अपने पास आते हुए देखकर कहा—'आर्यपुत्र आज दुःखी क्यों हो? यह मैं जानती हूँ कि तुम्हें बिन्दुमंती ने मेरा गर्भ फाड़ने के लिए कहा है। यह कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिए। उससे कुछ काम बनेगा इसमें कुछ भी क्रूरता नहीं है। इसलिए घृणा न करो'॥१९२-१९४॥ देवदत्त ब्राह्मण की कथा 'हे नाथ इस सम्बन्ध में मैं तुम्हें देवदत्त की कथा कहती हूँ सुनो—प्राचीन समय में कम्बुक नामक नगर में हरिदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। उस धनी ब्राह्मण का देवदत्त नामक एक पुत्र हुआ जो बाल्यावस्था में ही विद्वान् होकर भी युवावस्था में जूए का व्यसनी हो गया था॥१९५-१९६॥ एक बार जूए में अपने कपड़े तक हार जाने के कारण वह अपने पिता के घर न जा सका और लज्जित होकर वह एक देवमन्दिर में जाकर ठहरा॥१९७॥ वहाँ मन्दिर में अकेले उसने अनेक सामग्रियों को एकत्र करके एकान्त में जप करते हुए महाव्रती जाह्नपाद नामक तपस्वी को देखा॥१९८॥ देवदत्त धीरे से उसके पास जाकर प्रणाम करके बैठा। जाह्नपाद ने भी मौन त्यागकर उसका प्रेमपूर्ण वचनों से स्वागत किया॥१९९॥ कुछ समय बैठने के पश्चात् व्रती जाह्नपाद ने उसकी चिन्ता और दुर्दशा का कारण पूछा। उसके पूछने पर देवदत्त ने अपनी दुर्दशा का कारण जूए के व्यसन में धन का नष्ट हो जाना बताया॥२००॥ तब महातपस्वी जाह्नपाद ने कहा—'बेटा व्यसनियों के लिए पृथ्वी में पूरा धन ही नहीं है'॥२०१॥ यदि तुम मेरी बात मानो तो मेरी इच्छा तुम्हारा कष्ट दूर करने की है। मैंने अपनी साधना से जैसे विद्याधरत्व प्राप्त किया है और सिद्धि प्राप्त की है, उसे तुम भी मेरे साथ प्राप्त करो किन्तु मेरी आज्ञा का पालन करना होगा। तुम्हारी सब विपत्तियां दूर हो जायेंगी'॥२०२-२०३॥