BharatKosha
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 626 of 876

Read in context
Page 626

पंचम लम्बक ५७५ वैश्य का समाचार सुनकर शक्तिदेव ने रात को वहीं विश्राम किया और दूसरे दिन उससे कहा— हे व्यापारी मुझे पुनः उत्पस्थल-द्वीप जाना है। सो बताओ मुझे कैसे जाना चाहिए' ॥१३१-१३२॥ वैश्य ने कहा, —'आज ही मेरे व्यापारी वैश्य वहाँ जाने के लिए तैयार हैं तुम उन्हीं के जहाज पर चढ़कर वहाँ जाओ' ॥१३३॥ इस प्रकार उस वैश्य द्वारा वहाँ जाने की सारी व्यवस्था कर देने पर, शक्तिदेव उन्हीं के साथ उत्पलक-द्वीप को गया ॥१३४॥ वहाँ जाकर उसने निश्चय किया कि यहाँ जो मेरा भाई विष्णुदत्त रहता है वह अत्यन्त उदार है पहले उसी के मठ में निवास के लिए जाना चाहिए ॥१३५॥ ऐसा सोचकर वह ब्राह्मण बाजार के बीच से वहाँ जाने लगा ॥१३६॥ इसी बीच दैवयोग से सत्यव्रत नामक निषादराज के पुत्रों ने उसे देखा और पहिचान कर इस प्रकार पूछा —॥१३७॥ 'हे ब्राह्मण तुम तो कनकपुरी को ढूँढ़ते हुए मेरे पिता के साथ यहाँ से गये थे। अब तुम अकेले कैसे आ गये ? ॥१३८॥ तब शक्तिदेव ने कहा—'वह तुम्हारा पिता समुद्री भँवर द्वारा नाव को अपनी ओर खींच लेने पर बड़वानल के मुँह में जा गिरा' ॥१३९॥ यह सुनकर धीवर के पुत्र क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपने सेवकों से कहा— 'इस दुष्ट को बाँध लो। इसने हमारे पिता को मार डाला है ॥१४०॥ अन्यथा एक ही नाव पर एक साथ यात्रा करते हुए कैसे एक व्यक्ति बड़वानल में गिर गया और एक बच गया ॥१४१॥ इसलिए अपने पिता के इस हत्यारे को हम कल प्रातःकाल चंडिका देवी के सामने पशु की तरह इसका बलिदान करेंगे ॥१४२॥ इस प्रकार कहकर धीवर-पुत्रों ने नौकरों से उसे बँधवाकर चंडिका के मन्दिर में पहुँचा दिया ॥१४३॥ वह चंडिका-मन्दिर, निरन्तर प्राणियों को निगलनेवाला विशाल उदरवाला और लटकते हुए घंटे-रूपी दाँतोंवाला मानो मौत का प्रत्यक्ष मुँह था ॥१४४॥