कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextपंचम लम्बक ५८१ उसने भागते हुए सूअर पर प्रहार किया। आहत सूअर भी भागकर अपने बिल में चला गया॥१७५॥ उसे ढूँढ़ता हुआ वह शक्तिदेव भी बिल में घुसा और अन्दर जाकर क्षण-भर में उसने सुन्दर बने हुए निवास-गृहवाले एक वन उद्यान को देखा॥१७६॥ वहाँ जाकर उसने अद्भुत स्वरूपवाली और घबराई हुई एक कन्या को प्रेम से स्वागत के लिए आई हुई, साक्षात् वनदेवी के समान देखा॥१७७॥ और उससे पूछा—'कल्याणमयी तू कौन है? और तुझे इतनी व्याकुलता क्यों है? यह सुनकर वह सुन्दरी उससे इस प्रकार कहने लगी—॥१७८॥ 'हे सुन्दर! दक्षिण-देश में चंडविक्रम नाम का एक राजा है। मैं उसी की कन्या हूँ। मेरा नाम बिन्दुरेखा है। यह पापी दैत्य छलकर मुझे पिता के घर से हरण करके यहाँ ले आया है॥१७९-१८०॥ वह दैत्य मांस-भक्षण के लिए सूअर का रूप धारण करके बाहर गया। किसी से शक्ति द्वारा आहत होने पर वह मूर्च्छा यहाँ आकर मर गया। इसीलिए मैं भी घर से बाहर निकलकर भाग आई हूँ किन्तु मेरी कुमारावस्था को उसने दूषित (नष्ट) नहीं किया है'॥१८१-१८२॥ यह सुनकर शक्तिदेव ने उससे कहा—'तब चिन्ता की क्या बात है? हे राजपुत्रि मैंने ही शक्ति से इस सूअर को मारा है'॥१८३॥ तब वह कन्या कहने लगी कि तुम कौन हो यह बताओ। उत्तर में उसने कहा— 'मैं शक्तिदेव नामक ब्राह्मण हूँ'॥१८४॥ कन्या ने कहा—'तब तू ही मेरा स्वामी है।' उसके ऐसा कहने पर शक्तिदेव उसे लेकर बिल-मार्ग से बाहर निकल आया॥१८५॥ तदनन्तर उस कन्या को ले जाकर अपनी पत्नी बिन्दुमती को सौंप दिया। और, पत्नी के विश्वास दिलाने पर शक्तिदेव ने उस कन्या से पाणिग्रहण कर लिया॥१८६॥ तत्पश्चात् दो पत्नियोंवाले शक्तिदेव के वहाँ रहते हुए एक पत्नी गर्भवती हो गई इस गर्भ का अष्टम मास निकट आने पर शक्तिदेव की पहली पत्नी बिन्दुमती उसके पास जाकर धीरे-से कहने लगी—'वीर, उस बात का स्मरण करो जो तुमने पहले मुझसे प्रतिज्ञा की थी तुम्हारी दूसरी भार्या को आठ महीने का गर्भ हो गया है॥१८७-१८९॥