कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextवहाँ बाँधकर रखा गया शक्तिदेव अपने जीवन में संशय करता हुए चण्डिका की स्तुति करने लगा—॥१४५॥ 'हे भगवति भरपेट पिये हुए दैत्य के रुधिर समानों उदय होते हुए सूर्य-बिम्ब के समान वर्णवाली (अपनी) मूर्ति से तुमने संसार की रक्षा की है। इसलिए निरन्तर प्रणाम करते हुए, बिना कारण ही पामरों के हाथों में पड़े हुए और प्रेमी जनों की प्राप्ति के लिए दूर देश से आये हुए मेरी रक्षा करो'॥१४६ १४७॥ शक्तिदेव इस प्रकार देवी की स्तुति करके सो गया। उसने स्वप्न में देखा कि उस मन्दिर के गर्भगृह से एक दिव्य स्त्री निकली और उस पर मानों दया करती हुई कहने लगी— 'हे शक्तिदेव तेरा अनिष्ट नहीं होगा ॥१४८ १४९॥ इन धीवर-पुत्रों की बिन्दुमती नाम की बहिन है। वह अभी कुमारी है। प्रातःकाल तुझ देखकर अपना पति बनाने के लिए तुमसे प्रार्थना करेगी॥१५० ॥ तुम उसे स्वीकार कर लेना वही तुम्हें छुड़वा देगी। वह निषाद-जाति की कन्या नहीं है प्रत्युत शाप के प्रभाव से पतित दिव्य-स्त्री है"॥१५१॥ यह सुनकर शक्तिदेव के जागने पर प्रातःकाल ही आँखों में अमृत वर्षा करनेवाली धीवर कन्या उस देवी-मन्दिर में आई॥१५२॥ वह धीवर-कन्या शक्तिदेव के समीप आकर और अपना परिचय देकर उत्सुकता के साथ कहने लगी—'मैं तुम्हें छोड़वा दूँगी पर प्रतिज्ञा करो कि तुम मेरी इच्छा पूरी करोगे। मेरे विवाह के लिए मेरे भाइयों द्वारा सम्मत और लाये गये सभी वरों को मैंने अस्वीकृत कर दिया है किन्तु तुम्हे देखकर मुझे तुम पर प्रेम हो गया है इसलिए मुझे स्वीकार करो ॥१५३ १५४॥ धीवर-राज की कन्या बिन्दुमती के इस प्रकार कहने पर अपने स्वप्न को स्मरण करते हुए शक्तिदेव ने उसके प्रस्ताव को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया। और, इसी प्रतिज्ञा पर छुड़ाये गये उसने बिन्दुमती से विवाह भी कर लिया क्योंकि स्वप्न में चंडिका का आदेश पाकर उसके भाई बहिन की इच्छा से सम्मत हो गये थे॥१५५ १५६॥ पुण्य से प्राप्त की हुई सिद्धि के समान दूसरा रूप धारण की हुई उस दिव्य रमणी बिन्दु मती के साथ वह वहीं रहने लगा। एक बार भवन की छत पर उमा के साथ बैठे हुए शक्तिदेव ने सिर पर गोमांस का बोझ उठाये हुए और मार्ग पर चलते हुए एक चांडाल को देखकर अपनी पत्नी से पूछा—॥१५७-१५८॥ हे कृशोदरि, जो गाय तीनों लोकों के लिए वन्दनीय है उसका मांस यह पापी कैसे खाता है ? ॥१५९॥ ७३