कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextपंचम लम्बक ५८५ तपस्वी साम्बन द्वारा इस प्रकार कहे गये देवदत्त ने उसकी बात स्वीकार कर ली और तब से उसी के पास रहने लगा॥२४॥ महाव्रती जालपाद ने दूसरी रात्रि में श्मशान के पास जाकर वटवृक्ष के नीचे पूजा करके खीर और नैवेद्य चढ़ाकर दिशाओं को बलि फेंकते हुए पूजा की और साथ में बैठे हुए देवदत्त से कहा—॥२५-२६॥ देवदत्त तुम्हें भी प्रतिदिन इसी प्रकार पूजन करना चाहिए और पूजा करके कहना चाहिए, विद्युत्प्रभे ! इस पूजा को ग्रहण करो॥२७॥ इससे आगे मैं नहीं जानता। किन्तु हम दोनों को सिद्धि अवश्य मिलेगी। इतना कहकर वह तपस्वी उसको साथ लेकर अपने घर लौट आया॥२८॥ वह ब्राह्मण देवदत्त भी प्रतिदिन उस वटवृक्ष के नीचे जाकर उसी विधि से पूजन करने लगा॥२९॥ एक दिन देवदत्त के पूजा कर लेने के उपरान्त उस वृक्ष के तने को बीच से फाड़कर सहसा एक दिव्यस्त्री निकली॥२१०॥ वह कहने लगी—हे भले आदमी ! मेरी स्वामिनी तुम्हें बुलाती है। इस प्रकार कहकर उसे वह वृक्ष के अन्दर ले गई॥२११॥ देवदत्त ने अन्दर जाकर मणियों से निर्मित एक सुन्दर भवन देखा और उसके भीतर पर्यंक पर बैठी हुई एक सुन्दरी स्त्री देखी। उसे देखकर देवदत्त सोचने लगा सम्भव है यही हमारी मूर्तिमती सिद्धि हो। जबतक वह ऐसा सोचता है तबतक वह सुन्दरी रमणी उसका आतिथ्य करके शुम्भ्रायमान आभूषणों से सुशोभित अंगों से उसका स्वागत करती हुई कहने लगी— 'मैं रत्नपर्व नामक यक्ष की पुत्री विद्युत्प्रभा हूँ। इस महाव्रती जालपाद ने मेरी आराधना की है, उसको मैं भ्रष्टसिद्धि देनेवाली हूँ। किन्तु तुम तो मेरे प्राणों के भी स्वामी हो॥२१२-२१६॥ इसलिए बेअन्ते भाव से प्रेम करनेवाली मुझसे तुम पाणिग्रहण कर लो। उसके इस प्रकार कहने पर देवदत्त ने उससे विवाह कर लिया॥२१७॥ ७४