कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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यह सुनकर सत्यव्रत ने कहा—यह वटवृक्ष रूपी देवता है। इसके नीचे आनवाले आवर्त्त (भँवर) को बड़वानल (समुद्री अग्नि) का मुँह बताते हैं। इसीलिए नाववाले उस स्थान को छोड़कर चलते हैं क्योंकि उस भँवर में पड़े हुए नाव फिर लौटते नहीं ॥१०-११॥ जबतक सत्यव्रत इस प्रकार कह ही रहा था इतने में ही उसकी नाव पानी के वेग से उसी ओर बढ़ गई ॥१२॥ यह देखकर सत्यव्रत न शक्तिदेव से फिर कहा—'ब्राह्मण देवता ! हमारे विनाश का समय आ गया है ! ॥१३॥ क्योंकि यह नाव अकस्मात् उसी ओर बही जा रही है। इसे अब मैं किसी तरह भी नहीं रोक सकता ॥१४॥ हम लोग मृत्यु-मुख के समान इस गहरे भँवर में पड़ गये हैं। हमें बलवान् कर्म के समान वेगवान् जल ने इसमें ढकेल दिया है ॥१५॥ मुझे मृत्यु का दुःख नहीं है किसका शरीर अमर रहा है? दुःख केवल इसी बात का है कि इतना कष्ट उठाने पर भी तुम्हारे कार्य म सफलता न मिली ॥१६॥ मैं भरसक नाव को कुछ हटाने का यत्न कर रहा हूँ। तुम शीघ्र ही इस वटवृक्ष की शाखा को पकड़ने का यत्न करना ॥१७॥ तुम भव्य (सुन्दर) आकृतिवाले हो। सम्भव है तुम्हारा कल्याण हो। दैव के विधानों और सुदृढ़ तरंगों को कौन जान सकता है ॥१८॥ धैर्यशाली सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर नाव वटवृक्ष के पास आ गई। उसी समय शक्तिदेव ने बिना व्याकुलता के उछलकर वटवृक्ष की एक मोटी शाखा पकड़ ली ॥१९-२० ॥ किन्तु सत्यव्रत परोपकार के लिए निर्मित नाव से और अपने शरीर से बड़वानल के मुख में चला गया ॥२१॥ शक्तिदेव भी शाखाओं से आशा को पूर्ण करनेवाले उस वृक्ष की शाखा पर आश्रय पाकर, निराश हो सोचने लगा। मैंने कनकपुरी अभी तक नहीं देखी और ऐसे अवसर पर धीवरराज सत्यव्रत को खो दिया। सभी के सिर पर पैर रखकर खड़ी भवितव्यता (होनहार) को कौन मिटा सकता है ॥२२-२४॥