भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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पंचम लम्बक ५४१ 'हे महामना ! इसे लेकर मेरे साथ आओ। इस प्रकार दूर बैठी हुई स्त्री बोली-॥१८४॥ यह सुनकर उसका पीछा करते हुए उसने समीप ही एक वृक्ष के नीचे बैठी हुई, दिव्य रूप- वाली और रत्नों के आभूषणों से चमकती हुई, अनेक स्त्रियों से घिरी हुई और आसन पर बैठी हुई एक स्त्री को देखा ॥१८५॥ मरुभूमि में कमलिनी के समान उस स्थान (श्मशान) पर ऐसी स्त्री का रहना सम्भव नहीं था। उस स्त्री के द्वारा ले जाया गया अशोकदत्त उस बैठी हुई सुन्दरी के पास जाकर बोला-'मैं मनुष्य-मांस बेचता हूँ ले लो' ॥१८६-१८७॥ तब वह दिव्य रमणी बोली कि 'हे महापुरुष ! इसे किस मूल्य पर बेचते हो' ? ॥१८८॥ तब वीर अशोकदत्त ने हाथ में लिये हुए एक पायजेब दिखाकर कहा-'जो इसके ही समान दूसरी पायजेब मुझे देगा उसे दूंगा। यदि वह है, तो ले लो' ॥१८९॥ यह सुनकर वह बोली-'हाँ इसी का जोड़ा दूसरा पायजेब मेरे पास है। यह मेरा ही पायजेब तूने छीना है॥१९०॥ मैं वही स्त्री हूँ जिसे तुमने शूली में बिंधे हुए उस मनुष्य के पास उस दिन देखा था। इस समय दूसरा रूप बदलने के कारण तूने मुझे नहीं पहिचाना ॥१९१-१९२॥ तो अब मांस लेकर क्या होगा मैं जो कहती हूँ वह करो तो इसी के समान दूसरा पायजेब तुम्हें दूँगी' ॥१९३॥ इस प्रकार कहे गये उस वीर ने उसकी बात स्वीकार करके कहा-'जो तू कहेगी वह उसी समय करूँगा' ॥१९४॥ अशोकदत्त और विद्युत्प्रभा की विवाह-कथा तब उस दिव्य स्त्री ने उससे अपने मन की बात इस प्रकार कही-'हे धर्म सारथी ! हिमालय के शिखर पर विचर नाम का एक नगर है। वहाँ पर स्तम्भजिह्व नाम का एक राक्षसराज है। मैं उसकी विद्युत्प्रभा नाम की पत्नी हूँ और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली हूँ॥१९५-१९६॥ वह मेरा पति एक कन्या के उत्पन्न होने पर संग्रामस्फोट नाम के राक्षसराज द्वारा युद्ध में मारा गया ॥१९७॥