कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextपंचम लम्बक ५५५ उस समय विद्याधरों के गुरु से विद्या प्राप्त करके तुम दोनों शाप से मुक्त होकर पुनः विद्याधर बनोगे॥२८६॥ इस प्रकार उन मुनियों से होकर शापित हम दोनों यहाँ मनुष्य-योनि में उत्पन्न हुए। यहाँ हम दोनों का जैसे वियोग हुआ यह सब आपको ज्ञात ही है॥२८७॥ इस समय स्वर्ण-कमल लाने के कारण सास के प्रभाव से राक्षसराज के नगर में जाकर मैंने इस छोटे भाई को प्राप्त किया॥२८८॥ और वहीं गुरु प्रज्ञप्तिकौशिक से विद्याएं प्राप्त करके पुनः विद्याधर होकर शीघ्र यहाँ आये॥२८९॥ शाप-रूपी अन्धकार के दूर हो जाने से प्रसन्न अशोकदत्त ने इस प्रकार माता-पिता को तथा अपनी राजकुमारी पत्नी को अपनी विद्या की विशेषता से विद्या-प्रदान करके सभी को विचित्र चरित्र-वाला विद्याधर बना दिया॥२९०॥ तब वह राजा प्रतापमुकुट से मिलकर माता-पिता दोनों प्रियतमाओं और भाई के साथ वह धन्य अशोकदत्त आकाश-मार्ग से उड़कर अपने चक्रवर्ती स्थान को गया॥२९१॥ वहाँ जाकर और वहाँ से आज्ञा प्राप्त करके उसने अपना नाम जयाग्रवेग और छोटे भाई का नाम विजयवेग रखा ॥२९२॥ वे दोनों सुन्दर विद्याधर, सदन भाई, अपने बन्धु-बान्धवों से मिलकर गोविन्दकूट नामक अपने निवासस्थान को गये॥२९३॥ अपने देव-मन्दिर में दूसरे कलश में भी एक स्वर्ण-कमल रखकर और अशोकदत्त द्वारा प्रदत्त अन्य स्वर्ण-कमलों से शिवजी की पूजा करके अपनी कन्या के महान् सम्बन्ध से वह काशिराज प्रतापमुकुट भी अत्यन्त प्रसन्न और चकित हुआ॥२९४॥ इसी प्रकार दिव्य व्यक्ति किसी प्रकार शाप आदि किन्हीं कारणों से जीवलोक में जन्म लेते हैं और अपने स्वरूप के अनुरूप बल और उत्साह धारण करते हुए दुष्प्राप्य कार्यों में भी सफलता प्राप्त करते हैं॥२९५॥ इसलिए हे बल के समुद्र ! मैं समझता हूँ कि तुम भी अपने मनोरथ सिद्ध करनेवाले किसी देवता के अंश हो। उच्च व्यक्तियों का कठिन-से-कठिन कार्यों में उत्साहित होना उनके स्वभाव की महत्ता को प्रकट करता है॥२९६॥ यह तुम्हारी प्यारी राजकुमारी भी अवश्य दिव्य स्त्री है। नहीं तो वह कन्या कनकपुरी देखनेवाले पति को ही क्यों चाहती ? ॥२९७॥