कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक १३९ उसकी पारी आज है। आज वह मरने के लिए जायगा। इसके मर जाने पर मैं प्रात काल आग में प्रवेश करके जल मरूँगी॥२७०॥ इसलिए जीवित अवस्था में तुम्हारे ऐसे गुणवान् को आज भर दान देती हूँ जिससे फिर इस प्रकार का कष्ट न भोगना पड़े। ऐसा कहती हुई वृद्धा से धीरे-धीरे विदूषक बोला—अम्मा ! तुम घबराना मत। आज पारी में मैं जाऊँगा तुम्हारा एकलौता बेटा जीवित रहे। इसे क्यों मरवाऊँ—इस प्रकार तुम मुझपर दया भी न करना मेरे पास ऐसे सिद्धियोग हैं जिससे मुझे वहाँ जाकर मरने का भय नहीं है। ब्राह्मण के ऐसा कहने पर बूढ़ी बोली—॥२७१-२७४॥ मालूम होता है कि मेरे पुण्य-प्रभाव से तुम किसी देवता के रूप में आये हो इसलिए मेरे पुत्र को प्राण-दान करो और अपना भी कल्याण करो ॥२७५॥ इस प्रकार वृद्धा की सम्मति प्राप्त करके वह विदूषक सायंकाल सेनापति से नियुक्त किये गये दूत के साथ राजकन्या के यहाँ गया॥२७६॥ वहाँ जाकर उसने यौवन के मद में मदमाती और फूलों के न तोड़ने के कारण भार से झुकी हुई लता के समान राजकन्या को देखा॥२७७॥ तब रात्रि में राजकन्या के सो जाने पर पलंग पर ध्यान से प्राप्त अपनी तलवार को लिये हुए विदूषक जाग रहा था और यह सोच रहा था कि देखता हूँ यहाँ कौन है, जो मनुष्यों को मार देता है॥२७८-२७९॥ सब लोगों के सो जाने पर उसने किवाड़ों को खोलकर दरवाजे से घुसते हुए भीषण राक्षस को देखा ॥२८०॥ उसने द्वार पर खड़े-खड़े ही सैकड़ों पुरुषों के लिए यम-दण्ड के समान भीषण भुजा को घर के अन्दर डाला ॥२८१॥ विदूषक ने दौड़कर क्रोध से उसकी भुजा को एक ही खड्ग-प्रहार से काट डाला॥२८२॥ कटे हुए हाथवाला वह राक्षस मानों उसके उत्कृष्ट बल से डरकर फिर न आने के लिए शीघ्रता से भाग गया ॥२८३॥ राजकन्या ने जागकर उस कटकर गिरे हुए राक्षस के हाथ को देखा और उसे देखकर बड़ी प्रसन्न हुई तथा अचरज से चकित-सी रह गई॥२८४॥