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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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'लाकोत के उपर्युक्त मत के साथ श्रीविण्टरपित्स सहमत हैं (हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लिटरेचर, भाग १)। किन्तु आज तक मिले हुए रूपान्तरों के आधार से मूल ग्रन्थ की पुनः घटना करने के प्रयत्न को वे व्यर्थ मानते हैं। उनके मतानुसार लाकोत का मत संदिग्ध है और अपर्याप्त सामग्री की सहायता से प्रतिपादित किया गया है। विण्टरपित्स के इस कथन में इतना ही यथार्थ है कि जबतक और अधिक सामग्री न मिले तबतक लाकोत के निर्णयों में बहुत सुधार की गुंजाइश नहीं। जब १९०८ में लाकात ने अपना ग्रन्थ लिखा था उसके साथ बृहत्कथा की कठिन समस्या को सुलझाने के लिये कोई उपयोगी सामग्री न मिली थी। "अब जैनों के पास काश्मीरी और नैपाली इन दोनों रूपान्तरों से विस्तृत बृहत्कथा का एक रूपान्तर प्राप्त हुआ है, जो ध्यान खींचता है और आश्चर्यजनक है। नरवाहनदत्त के पराक्रम को जैनों ने कृष्ण के पिता वसुदेव पर आरोपित कर दिया है। वसुदेव हिण्डी (वसुदेव का परिभ्रमण) यह जैनों की पुरानी कथाओं में एवं विश्व के प्राचीन कथा-साहित्य में एक महत्त्व का ग्रन्थ है। वर्षों पहले प्रकाशित हेमचन्द्र के त्रिपष्टिशलाकापुरुषचरित्र में श्रीनेमिनाथ चरित्र के अन्तर्गत वसुदेव का चरित्र भी आया है। उसमें जैन बृहत्कथा की रूपरेखा दिखाई पड़ती है। उसमें एवं श्रीकृष्ण की प्राचीन कथाओं से सम्बन्धित जैन ग्रन्थों में इसका संक्षिप्त सार प्राप्त होता है। किन्तु कुछ वर्ष हुए, भारतवर्ष में संघदासगणि कृत जो वसुदेव हिण्डी नामक ग्रन्थ ज्ञात हुआ है वह अपने विस्तार और विषय के कारण जैन बृहत्कथा में हुए परिवर्तनों को जान लेना सुगम करता है। आवश्यकचूर्णि में तीन बार वसुदेव हिण्डी का उल्लेख है जिससे ज्ञात होता है कि ६ ईसवी के आसपास इसकी रचना की अन्तिम मर्यादा थी। ग्रन्थ की अत्यन्त प्राचीन भाषा से भी उसका रचना-काल प्राचीन सूचित होता है। लगता है कि इस नए मिले हुए प्राकृत-ग्रन्थ में बृहत्कथा का प्राचीनतम रूपान्तर प्राप्त हो गया है। किन्तु इस ग्रन्थ में बृहत्कथा की वस्तु को श्रीकृष्ण की प्राचीन कथा के आधार पर गूंथ दिया गया है जो हर्मनया श्रीयाकोबी के मतानुसार जैनों में ईसवी सन् से ३ वर्ष पूर्व अस्तित्व में आ चुकी थी। श्रीयाकाबी मानते हैं कि ईस्वी-सन् के प्रारम्भ तक जैन पुराण-कथा सम्पूर्ण बन चुकी थी। जिस समय जैनों ने बृहत्कथा को अपनी पुराण-कथा के डम्बर में शामिल किया उस समय वह एक सुप्रसिद्ध कवि की कृति होने के अतिरिक्त दैव कथा की भव्यता से प्रकाशमान प्राचीनतर युग की रचना मानी जाने लगी थी जिसकी महत्ता पुराण एवं महाकाव्यों की कथाओं के समान हो गई थी। इसका अर्थ यह हुआ कि बृहत्कथा के जैन रूपान्तर से मूल बृहत्कथा का रचनाकाल कई शती प्राचीनतर मानना पड़ता है। श्रीबूलर ने गुणाढ्य का समय ईस्वी-सन् की पहली या दूसरी शती में और लाकोत ने तीसरी शती में माना था। उसके बदले यदि बहुत प्राचीन समय में नहीं तो उसे ईस्वी-सन् की पहली या दूसरी शती पूर्व में मानना चाहिए। 'लाकोत के मत के अनुसार नष्ट हुई बृहत्कथा की आयोजना इस प्रकार थी—प्रस्तावित भाग में उदयन और उसकी रानी वासवदत्ता एवं पद्मावती की सुविदित कथा थी। वासवदत्ता का पुत्र नरवाहनदत्त जब युवा राजकुमार की अवस्था को प्राप्त हुआ तब उसका गन्धर्वपुत्री