भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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वा परिच्छेदों में शालभञ्जिका या स्त्रियों की कथाएँ थीं। दशरूपक के कर्त्ता धनंजय ने जो मालव राज मुंज का सभासद था रामायण के साथ बृहत्कथा का उल्लेख किया है। इससे यह अनुमान किया गया है कि शायद रामायण की तरह बृहत्कथा की रचना भी सर्गों में हुई हो पर इस अनुमान के लिए पर्याप्त कारण नहीं है और यही सम्भावना अधिक प्रतीत होती है कि मूल पैशाची बृहत्कथा में ही कथाओं के विभाग को लम्भ या लम्भक जैसे मिलते-जुलते शब्द से सूचित किया गया था और उसी परम्परा में बना लम्भक शब्द सुबन्धु के समय में प्रयुक्त होने लगा था। बृहत्कथा के मूल स्वरूप पर प्रकाश डालने के लिए संघदासगणि-कृत वसुदेव हिण्डी की प्राप्ति उल्लेखनीय घटना है। 'हिण्डी' शब्द का अर्थ परिभ्रमण या पर्यटन है। संघदासगणि ने जो वसुदेव हिण्डी लिखी उसमें उन्होंने यद्यपि बृहत्कथा को ही आधार बनाया था किन्तु ग्रन्थ के ठाट और उद्देश्य में काफी परिवर्तन किए। जहाँ बृहत्कथा लौकिक कामकथा थी वहाँ संघदास ने वसुदेव हिण्डी को धर्मकथा का रूप दिया और जैनधर्म की प्रभावना करनेवाले कितने ही प्रसंगों को उसमें यथास्थान सम्मिलित किया। इससे भी अधिक महत्त्व का परिवर्तन कथा के नायक का बदल डालना था। पैशाची बृहत्कथा में वत्सराज उदयन के पुत्र नरवाहनदत्त के विवाहों की कहानियाँ थीं किन्तु संघदास ने अन्धकवृष्णि-वंश के प्रसिद्ध पुरुष वसुदेव को अपना नायक बनाया। वसुदेव हिण्डी में २९ लम्भक हैं और यह महाराष्ट्री प्राकृत भाषा में गद्य-शैली में है जिसमे कुछ मिलाकर लगभग ११ हजार श्लोक प्रमाण की सामग्री है। वसुदेव हिण्डी के भी जैन परम्परा में दो रूप मिलते हैं। पहला ग्रन्थ तो यही संघदासगणि का रचा हुआ है। इसे प्रथम खण्ड कहते हैं। किन्तु इसी का एक दूसरा खण्ड उपलब्ध है जो मध्यम खण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। उसकी रचना धर्मदासगणि ने अपने पूर्ववर्ती संघदासगणि की रचना को आगे बढ़ाते हुए लगभग दो शती बाद की। उसकी भूमिका में धर्मदास ने कहा है—'कृष्ण के पिता वसुदेव ने १०० वर्ष तक परिभ्रमण किया और अनेक विद्याधरों एवं राजाओं की कन्याओं से विवाह किया। संघदासगणि ने वसुदेव के केवल २९ विवाहों का वर्णन किया था। शेष ७१ विवाहों की कथा उसने विस्तार-भय से छोड़ दी थी। उसे मध्यम या बीच के लम्भकों के साथ कथासूत्र मिलाते हुए मैं कह रहा हूँ।' धर्मदासगणि-कृत मध्यम वसुदेव हिण्डी में ७१ लम्भक १७ श्लोकों में पूर्ण हुए हैं। यह बड़ा ग्रन्थ अभी तक अप्रकाशित है इसलिये इसकी कहानियों के विषय में विशेष कुछ नहीं १ सुव्वइ य किल वसुदेवेणं वाससतं परिब्भमंतिएं इमम्मि भरहे विज्जाधरिवरवइत्ति बालदुक्खंवाससंभवाणं कन्याणं सतं परिणीतं तत्थ य सामावियपमावियाणं रोहिणीपञ्चउवसायाणं एगुणतीस लम्भता संघदासवायरएणं उवणिबद्धा। एगसत्तरिं च वित्थारभीएणा कहामज्झे छड्डिया। तो हुं भो सोहयसिगारकहापसंसणं असहमागं आयरियसयाते अवधारेऊणं पवयणणुरागेणं आयरियमिओएण य तेंति लब्भित्थलक्खणमग्गं गंधव्वएणे जग्गुत्तउत्तो हे। तं सुणह इतो पुव्वकहाणुसारेण चेव।