भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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गुणाढ्य-कृत मूल बृहत्कथा अब प्राप्य नहीं है। ज्ञात होता है सोमदेव के बाद उस महान् ग्रन्थ का लोप हो गया। किन्तु कालक्रम से बृहत्कथा के जो रूपान्तर बने उनमें चार अबतक प्राप्त हैं। पहला बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह है। इसकी रचना संस्कृत में लगभग पाँचवीं शती में हुई। इसमें २८ सर्ग हैं, पर ग्रन्थ अपूर्ण रहा। इसके कर्ता बुधस्वामी ने गुप्तकालीन स्वर्ण-युग की संस्कृति के साँचे में बृहत्कथा को ढालने का यत्न किया। विद्वान् इसे बृहत्कथा की पैशाची वाचना मानते हैं। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह का देवनागरी-लिपि में मूल संस्करण और फ्रेंच-अनुवाद फीकाकोत ने पेरिस से प्रकाशित कराया था। बुधस्वामी के प्रायः साथ ही या संभवतः १ वर्ष के भीतर बृहत्कथा का एक प्राकृत संस्करण जैन परम्परा में संघदासगणि ने वसुदेव हिण्डी के नाम से तैयार की। मूल बृहत्कथा में नरवाहनदत्त नायक था। वह वत्सराज उदयन का पुत्र था। कालिदास ने लिखा है कि मालवा के गाँवों में वहाँ के बड़े-बूढ़े उदयन की कहानी कहने में चतुर थे। उदयन से सम्बन्धित यह कहानी केवल वासवदत्ता और उदयन की प्रेम-कहानी तक सीमित न रही होगी। उतना अंश तो कथा- सरित्सागर के आरम्भ में ही है, किन्तु उदयन की कहानी का पूरा चक्र था। उसके ही पेटे में उसके पुत्र नरवाहनदत्त के विवाह की अनेक कथाएँ भी थीं। पुत्र ने पिता के पद-चिह्नों पर चलते हुए अपने जीवन में अनेक प्रेम-परिणयों का ठाट विकसित किया। नरवाहनदत्त के अनेक विवाहों के वर्णन करने के कारण मूल बृहत्कथा का स्वरूप कामकथा या शृंगारकथा जैसा था। नरवाहनदत्त देशान्तरों का भ्रमण करते हुए जहाँ जाता वहीं उसकी यात्रा का पर्यवसान एक विवाह के रूप में होता था। जैसे व्यापारी धन कमाकर सकुशल लौट आने पर सिद्ध यात्री बनते हैं वैसे ही नरवाहनदत्त के चरित में द्वीपान्तर-पर्यटन की सिद्ध यात्रा एक नई रानी के साथ विवाह के रूप में होती है। कथासरित्सागर में जहाँ एक ओर अपने नाम के अनुसार १२४ तरंगों का विभाग है वहीं उसके १८ लम्बक भी हैं। यह लम्बक शब्द अपने मूल स्रोत की ओर संकेत करता है। लम्बक का मूल संस्कृत रूप लम्भक था। एक विवाह द्वारा एक स्त्री की प्राप्ति 'लम्भ' कहलाती थी और उसी की कथा के लिए लम्भक शब्द प्रयुक्त हुआ। तदनुसार ही अलंकारवती लम्भक, शशांकवती लम्भक इत्यादि अलग-अलग कथाओं के नाम पड़ होंगे। हेमचन्द्र ने अपने काव्यानुशासन की टीका में स्पष्ट शब्दों में बृहत्कथा को लम्भों में विभक्त कहा है। वही लम्भक का मूल रूप ज्ञात होता है। वादीभसिंह-कृत गद्य-चिन्तामणि में नायक द्वारा पत्नी की प्राप्ति का वर्णन करनेवाले कथाखण्डों को लम्भ कहा है। स्मरण रखने की बात है कि वसुदेव हिण्डी के विभागों में तो लम्भक शब्द है किन्तु बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह में ग्रन्थ का विभाग सर्गों में हुआ है अर्थात् वह एक सर्गबद्ध रचना है, पर वहाँ भी प्रत्येक कथा के अन्त में 'लाभ' शब्द आया है। ज्ञात होता है कि लम्भ या उसी के प्राकृत रूप लम्भ का प्रयोग गुप्तकाल में होने लगा था। सुबन्धु-कृत वासवदत्ता में जिसकी रचना चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के कुछ बाद पाँचवीं शताब्दी के आरम्भ में हुई, बृहत्कथा को लम्भों से युक्त कहा है—बृहत्कथालम्बैरिव सालभञ्जिकासन्निधैः अर्थात् बृहत्कथा के लम्भों