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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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प्रथम लम्बक ७९ तब मेरी माता उन सम्बन्धियों की लूट-खसोट के भय से गर्भ की रक्षा करती हुई अपने पिता के मित्र कुमारदत्त के घर जाकर रहने लगी ॥३०॥ कुमारदत्त के घर में उस पतिव्रता के जीवन का आधार मैं उत्पन्न हुआ। मेरी माता कष्टसाध्य कार्य करती हुई, मुझे जिलाने लगी ॥३१॥ मेरे कुछ बड़े होने पर उस अकिंचन और दीन माता ने गुरु से प्रार्थना करके मुझे अक्षर लिखना और कुछ गणित (हिसाब-किताब) सिखा दिया ॥३२॥ कुछ पढ़ लेने पर माता ने कहा—'बेटा! बनिये के बालक हो व्यापार करो। इस नगर में विशाखिल नाम का एक धनी व्यापारी बनिया है। कुलीन घर के दरिद्र लोगों को वह व्यापार का सामान देता है। अतः तुम उसी के पास जाओ और माँगो' ॥३३-३४॥ माता की आज्ञा से मैं उस बनिये के पास गया। उस समय विशाखिल बनिया क्रोध में किसी बनिये के लड़के से कह रहा था कि यहाँ भूमि पर एक मरा हुआ चूहा पड़ा है। यदि चतुर बनिया हो तो इस सौदे से भी धन कमा सकता है ॥३५-३६॥ हे दुष्ट, मैंने तुझे बहुत-सी स्वर्ण-मुद्राएँ दीं उनकी वृद्धि तो दूर रही तूने उनकी रक्षा भी नहीं की ॥३७॥ बनिये की बातें सुनकर मैंने विशाखिल से कहा—मैंने बेचने के सामान में तुझसे इस चूहे को लिया ॥३८॥ ऐसा कहकर मैंने मरे हुए चूहे को हाथ से उठाकर एक डिब्बे में रख लिया और बनिये की बही में लिखकर चला। मेरे इस कार्य पर वह बनिया भी हँसने लगा ॥३९॥ मैंने दो अँजुली चने के बदले उस चूहे को किसी बनिये की बिल्ली को ग्रास के लिए दे दिया ॥४०॥ उस चने को भाड़ में भुनाकर और एक घड़ा पानी लेकर मैं शहर के बाहर एक चौराहे पर पेड़ की छाया में जा बैठा ॥४१॥ लकड़ी का बोझ लेकर जानेवाले थके मजदूरों को मैं नम्रता के साथ चना खिलाने और ठंडा पानी पिलाने लगा ॥४२॥ प्रत्येक लकड़हारा अपने-अपने बोझ से दो-दो लकड़ियाँ मुझे प्रेमपूर्वक देने लगा। इस प्रकार कुछ समय में मेरे पास लकड़ी का एक खासा एकत्र हो गया और मैंने उसे बाजार में जाकर बेच दिया ॥४३॥ लकड़ी बेचकर प्राप्त हुए मूल्य में से कुछ मूल्य से चने खरीदकर मैंने दूसरे दिन फिर उसी प्रकार चौराहे पर पानी पिलाना प्रारम्भ किया। इस प्रकार मेरे पास पर्याप्त मात्रा में लकड़ियाँ इकट्ठी हो गईं ॥४४॥