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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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प्रथम लम्बक १११ तब राजा ने अपना सारा शरीर तराजू पर चढ़ा दिया और 'साधु-साधु'—इस प्रकार की आकाशवाणी हुई ॥१९५॥ तब इन्द्र और धर्म ने बाज एवं कबूतर का रूप छोड़कर और प्रसन्न होकर राजा के शरीर को पहले ही जैसा अक्षत कर दिया ॥१९६॥ इसी प्रकार मेरी परीक्षा करने के लिए यह कोई देवता आया है ॥१९७॥ मन्त्रियों से इस प्रकार कहकर भय से नम्र राजा सुशर्मा उस ब्राह्मण-रूपी यक्ष से बोला— 'महाराज ! अभय-दान दो ! भली भाँति सुरक्षित वह तुम्हारी स्नुषा (पतोहू) आज की रात किसी माया के द्वारा हरण कर ली गई। क्षमा करो' ! ॥१९९॥ यह ब्राह्मण कठिनाई और दया भाव से बोला—'राजन् ! यदि ऐसा है तो मेरे पुत्र के लिए अपनी कन्या दो' ॥१ ॥ यह सुनकर शाप से त्रस्त राजा ने अपनी कन्या देवदत्त को दे दी और तब पंचशिख भी शिवलोक को गया ॥१ १॥ देवदत्त भी अपनी प्यारी राजकन्या को प्रयास-रूप से प्राप्त करके श्वशुर-संपत्ति का आनन्द लेने लगा क्योंकि राजा को उस कन्या के अतिरिक्त कोई दूसरी सन्तान न थी ॥१ २॥ कुछ समय के अनन्तर देवदत्त के पुत्र और अपने दौहित्र महीधर का राज्य में अभिषिक्त करके राजा सुशर्मा अन्तिम अवस्था में वन को चला गया ॥१ ३॥ कुछ समय के अनन्तर अपने बालक को राज्य करते हुए देखकर कृतार्थ होकर वह देवदत्त भी उस राजपुत्री के साथ तपोवन में गया ॥१ ४॥ देवदत्त तपोवन में पुनः शिवजी की आराधना करके शिवजी को प्रसन्न करके और इस मानव-देह को छोड़कर शिव का गण बन गया ॥१ ५॥ पिता के दोषों से फैले हुए पुण्य से वह गणेश का न समझ सका अतः उसका नाम पुण्यदन्त हुआ और उसकी पत्नी जया नाम से पार्वती की प्रतिहारी बन गई। अब मेरे नाम का कारण सुनो ॥१ ६ १ ७॥ माल्यवान् की पूर्वकथा मैं उसी देवदत्त के पिता गोविन्ददत्त का सोमदत्त नामक बालक था ॥१ ८॥ मैं भी उसी पश्चात्ताप के कारण घर से निकलकर हिमाचल पर तप करने लगा और उस समय बहुत-सी पुण्यशालाओं से शिवजी को प्रसन्न करता था ॥१ ९॥