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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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प्रथम लम्बक ११५ तदनन्तर गुणदेव और नन्दिदेव नामक गुणाढ्य के दो शिष्यों ने गुरु गुणाढ्य से कहा ॥९॥ इस काव्य के समर्पण का एकमात्र स्थान राजा सातवाहन है। वह रसिक है। वह, फूलों की सुगन्ध को वायु जिस प्रकार फैला देती है उसी प्रकार इसका प्रसार और प्रचार कर सकता है ॥१० ॥ 'यही ठीक है'—ऐसा कहकर गुणाढ्य ने पुस्तक देकर उन दोनों गुणी शिष्यों को राजा सातवाहन के पास भेज दिया ॥११॥ और स्वयं प्रतिष्ठान-नगर के बाहर देवी-उद्यान में मिलने का संकेत करके ठहर गया ॥१२॥ गुणाढ्य के दोनों शिष्यों ने राजा सातवाहन के पास जाकर 'यह गुणाढ्य की रचना है' ऐसा कहकर वह उत्तम काव्य दिखाया ॥१३॥ उस पिशाच-भाषा को सुनकर और उन दोनों शिष्यों को पिशाचाकार देखकर विद्या- मदान्ध राजा ने द्वेष के साथ कहा—सात लाख छन्द, नीरस पिशाच-भाषा और रक्त से अक्षरों का लेखन—ऐसी इस पिशाच-कथा को धिक्कार है ! ॥१४-१५॥ तब उन शिष्यों ने पुस्तक ले जाकर, जो कुछ हुआ था सब उस गुणाढ्य को सुना दिया ॥१६॥ यह सब सुनकर गुणाढ्य को अत्यन्त खेद हुआ। तत्वज्ञ गुणग्राही व्यक्ति के द्वारा अपमान होने पर किसका हृदय संतप्त नहीं होता ॥१७॥ गुणाढ्य भी शिष्यों को साथ लेकर समीपवर्ती पर्वत पर चला गया और एक साफ़-सुथरे एकान्त स्थान में उसने एक अग्निकुण्ड बनाया ॥१८॥ गुणाढ्य बृहत्कथा के एक-एक पत्र को पढ़कर और मृग-पक्षियों को सुनाकर उसे आग में बहा देता था। शिष्य आँखों से आँसू बहाकर उसकी ओर देखते थे ॥१९॥ शिष्यों के अनुरोध से नरवाहनदत्त-चरित नामक एक भाग को उसने बचा लिया जो एक लाख श्लोकों में था ॥२०॥ जब गुणाढ्य उस दिव्य कथा के एक-एक पत्र को पढ़ रहा और जला रहा था उस समय जंगल के सभी पशु-हिरन सूअर, भैंसे आदि—झुंड में निश्चल होकर और घास चरना छोड़ कर आँसू बहाते हुए कथा को सुन रहे थे ॥२१-२२॥ इसी बीच राजा सातवाहन अस्वस्थ हो गया। वैद्यों ने बताया कि इसका कारण सूखे मांस का भोजन है ॥२३॥

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