कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextराजा को सूखा मांस खिलाने के लिए डाँटे गये रसोईदारों ने कहा कि इसमें हमारा क्या अपराध है? बहेलिये जैसा मांस लाते हैं वही हम पकाते हैं ॥२४॥ शिकारी बहेलियों ने पूछने पर कहा कि यहाँ से समीप ही एक पहाड़ की चोटी पर कोई ब्राह्मण एक-एक पत्र पढ़कर अग्नि में फेंक रहा है ॥२५॥ इसलिए जंगल के समस्त प्राणी एकत्र होकर और निराहार रहकर उसे सुनते हैं। कहीं चरने के लिए नहीं जाते इसीलिए उनका मांस सूख गया है ॥२६॥ राजा व्याधों के इस प्रकार के वचन सुनकर और उन्हें ही आगे करके अत्यन्त कौतूहल के साथ गुणाढ्य के पास गया ॥२७॥ राजा ने वनवास के कारण बढ़ी हुई जटाओं से आवृत गुणाढ्य को इस प्रकार देखा मानों भस्मलेप धारण-रूपी अग्नि की पतली धूम-रेखाएँ लटक रही हैं ॥२८॥ आँसू बहाते हुए मृग-पक्षियों के मध्य बैठे हुए गुणाढ्य को पहचानकर राजा ने नमस्कार किया और सब समाचार पूछा। गुणाढ्य द्वारा बृहत्कथा का वृत्तान्त सुनकर और गुणाढ्य को माल्यवान् नामक शिव-गण का अवतार जानकर राजा पैरों पर गिर पड़ा और उसने शिवजी के मुख से निकली हुई वह दिव्य कथा उससे माँगी ॥३०-३१॥ गुणाढ्य ने राजा सातवाहन से कहा—'राजन्, छह लाख श्लोकों में लिखी गई छह कथाएँ मैंने जला दीं ॥३२॥ एक लाख श्लोक की एक कथा यह बची है—इसे ले लो। मेरे ये दोनों शिष्य इस कथा के व्याख्याता होंगे ॥३३॥ ऐसा कहकर और योग-समाधि द्वारा अपने मानव-शरीर का त्याग कर शाप-मुक्त गुणाढ्य ने अपने पूर्व पद को प्राप्त किया ॥३४॥ तदनन्तर राजा सातवाहन गुणाढ्य द्वारा दी गई नरवाहनदत्त-चरितमयी बृहत्कथा नामक वह कथा प्रसन्नतापूर्वक लेकर अपने नगर में आया ॥३८॥ राजा ने नगर में आकर, गुणाढ्य के शिष्य गुणदेव और नन्दिदेव को भूमि धन वस्त्र वाहन भवन धन आदि देकर उनकी सेवा की ॥३९॥ राजा सातवाहन ने उन दोनों शिष्यों की सहायता से उस कथा के प्रचार के लिए उसका देश-भाषा में अनुवाद कराकर कथापीठ की रचना की ॥४०॥ विचित्र रसों से परिपूर्ण एवं देव-कथाओं को भुला देनेवाली यह कथा नगर में निरन्तर प्रसिद्ध होती हुई क्रमशः सारे भूमण्डल में प्रसिद्ध हो गई ॥४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का अष्टम तरंग समाप्त कथासरित्सागर का प्रथम लम्बक समाप्त