कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextद्वितीय लम्बक १४७ साथ जाता हुआ धीदत्त भी उसी पलंग पर उसके साथ ही बैठ गया। इसके उपरान्त उस खड़ी स्त्री ने सहसा रोना प्रारम्भ किया॥३६॥ उसके उष्ण अश्रुबिन्दु स्तनों पर गिरते गये इस प्रकार उसका रुदन देखकर धीदत्त के हृदय में दया आ गई॥३७॥ धीदत्त न उससे पूछा-'तुम कौन हो? तुम्हें क्या दुःख है? बताओ सुन्दरि ! मैं तुम्हारे दुःख को दूर करने में समर्थ हूँ'॥३८॥ तब उसने अत्यन्त कठिनता से कहा-'हम दैत्यराज बलि की एक सहस्र पुत्रियां हैं जिनमें सबसे बड़ी विद्युत्प्रभा मैं हूँ'॥३९॥ विष्णु ने मेरे पितामह (दादा) बलि को लम्बे बन्धन में डाल दिया है और हमारे पिता को मरुद्बुद्ध में मार डाला॥४०॥ मेरे पिता को मारकर उस विष्णु ने हम अपने नगर से निर्वासित कर दिया। साथ ही नगर में जाने की रोक के लिए बीच में एक सिंह को खड़ा कर दिया है॥४१॥ उस सिंह ने वह स्थान और हमारा हृदय दोनों आक्रान्त कर दिया। वह सिंह एक यक्ष है, जो कुबेर के शाप से सिंह बन गया है॥४२॥ जब पुर-प्रवेश के लिए हम लोगों ने विष्णु से प्रार्थना की तब उन्होंने इस यक्ष का शाप नष्ट होने की बात कही थी। (मनुष्य द्वारा इस सिंह की हत्या होगी तब इसका शाप नष्ट होगा) ॥४३॥ इसलिए तुम हमारे शत्रु उस सिंह को जीतो या मार डालो। हे वीर ! मैं तुम्हें इसीलिए यहाँ लाई हूँ॥४४॥ उस सिंह को मार डालने पर उससे मृगांक नामक खड्ग भी तुम्हें प्राप्त होगा जिसके प्रभाव से तुम पृथ्वी को जीतकर राजा बनोगे॥४५॥ ऐसा सुनकर और ठीक है यह कहकर धीदत्त ने वह दिन वहीं व्यतीत किया और अगले दिन उन दैत्य-कन्याओं को आगे करके उस नगर को गया॥४६॥ यहाँ पर उसने मल्लयुद्ध से उस सिंह को जीत लिया। वह सिंह भी शापमुक्त होकर पुरुष के आकार में बदल गया॥४७॥ शाप से छुड़ानेवाले धीदत्त पर प्रसन्न होकर उस पुरुष ने उसे एक तलवार दी और दैत्यकन्याओं के मुख के साथ ही अदृश्य हो गया॥४८॥ तदनन्तर धीदत्त छोटी बहनों के साथ उस दैत्य-कन्या को लिये हुए उस नगर में गया॥४९॥ दैत्य-कन्या ने धीदत्त को विषनाश करनेवाली एक अंगूठी दी। वहाँ रहते हुए युवा धीदत्त का हृदय उस दैत्य-कन्या की ओर आकृष्ट हुआ॥५०॥ १८