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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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द्वितीय लम्बक १५१ चूंकि तुम्हें देवी के सम्मुख बलिदान के लिए निश्चित किया गया है इसीलिए अच्छे भोजन और वस्त्रों से तुम्हारा सत्कार किया जा रहा है ॥१४३॥ यदि तुम मानो तो तुम्हारी मुक्ति का एक उपाय है। वह यह कि इस भिल्लराज की सुन्दरी नाम की एक कन्या है॥१४४॥ वह तुम्हें देख अत्यन्त कामातुर हो रही है। मेरी उस सहेली को यदि तुम पत्नी बना लो तो तुम्हारा कल्याण होगा ॥१४५॥ धीवर ने भी उसके इस प्रस्ताव को स्वीकार कर गान्धर्व विधि से उस भिल्लराज की कन्या के साथ गुप्त विवाह कर उसे पत्नी बना लिया॥१४६॥ वह सुन्दरी प्रतिदिन रात में धीवर के बन्धन खोल देती थी इस प्रकार कुछ दिनों में वह गर्भवती हो गई॥१४७॥ कुछ समय के अनन्तर सुन्दरी की माता ने मोचनिका से सब समाचार ज्ञात किया और वह जामाता के स्नेह से बोली—बेटा ! धीचण्डनामक सुन्दरी का पिता अति क्रोधी है, वह तुम्हें छोड़ेगा नहीं अतः तुम जाओ किन्तु सुन्दरी को मत भूलना ॥१४८-१४९॥ ऐसा कहकर सास के द्वारा कैद से छुड़ाया गया धीवर भिल्लराज के हाथ लगे अपने कङ्कण के लिए सुन्दरी को समझाकर, चिन्ता से आक्रान्तहृदय होकर, मृगांकवती का पता लगाने के लिए फिर उसी विन्ध्यारण्य में गया ॥१५०-१५१॥ चलने के समय शुभ शकुनों को देखकर वह फिर उसी स्थान पर आ गया जहाँ घोड़ा मरा था और जहाँ से मृगांकवती खो गई थी॥१५२॥ वहाँ पर एक व्याध (बहेलिया) को सामने आते हुए देखकर धीवर ने उससे मृगभवनी का समाचार पूछा ॥१५३॥ 'क्या तुम्हीं धीवर हो ?' बहेलिये के इस प्रकार पूछने पर धीवर ने लम्बी सांस लेते हुए कहा 'हाँ मैं ही वह अभागा हूँ' ॥१५४॥ तब बहेलिये ने कहा 'मित्र बताता हूँ सुनो। तुम्हारा नाम लेकर विलाप करती हुई तुम्हारी भार्या को इधर-उधर भटकते हुए देखा तो मैंने उससे सारे समाचार जानकर और धीरज बँधाकर (समझा-बुझाकर) यथावत् उसे मैं अपने गाँव ले गया॥१५५-१५६॥ वहाँ गाँव में जबान भीलों को देखकर उनके भय से मैं उसे मथुरा के समीप नागस्थल नामक स्थान को ले गया ॥१५७॥