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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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द्वितीय लम्बक १५३ वहाँ (नागस्थल में) मैंने उसे विश्वदत्त नामक वृद्ध ब्राह्मण के घर में गौरव के साथ धरोहर के रूप में रख दिया है। उसी से तुम्हारा नाम जानकर मैं तुम्हें ढूँढ़ने के लिए यहाँ आया हूँ ॥१५८-१५९॥ बहेलिये से इस प्रकार कहा गया धीरदत्त शीघ्र ही वहाँ से चल पड़ा और दूसरे दिन सायंकाल नागस्थल पहुँच गया ॥१६०॥ वहाँ विश्वदत्त के घर आकर और उससे मिलकर धीरदत्त ने कहा कि 'बहेलिये द्वारा रखी गई मेरी भार्या मुझे दे दो' ॥१६१॥ यह सुनकर विश्वदत्त ने धीरदत्त से कहा— मथुरा में मेरा एक मित्र गुणग्राही ब्राह्मण है। वह उपाध्याय है और राजा शूरसेन का मन्त्री भी है। मैंने उसी के पास तुम्हारी पत्नी को रख दिया है ॥१६२-१६३॥ यह ग्राम निर्जन है अतः यहाँ उसकी रक्षा सम्भव न थी। अब तुम प्रातःकाल वहाँ जाओ। आज यहीं विश्राम करो ॥१६४॥ विश्वदत्त से इस प्रकार कथित धीरदत्त उस रात को वहीं बिताकर दूसरे दिन प्रातःकाल मथुरा पहुँचा ॥१६५॥ लम्बे रास्ते के कारण मैला-कुचैला तथा थका हुआ धीरदत्त नगर के बाहर ही ठहर गया और निर्मल बावली के जल में स्नान करने लगा ॥१६६॥ स्नान करते हुए उसे चोरों द्वारा बावली में छिपाये हुए कुछ वस्त्र मिले जिनकी गाँठ में एक बहुमूल्य हार बँधा हुआ था। उसे धीरदत्त ने वहीं देखा ॥१६७॥ उन कपड़ों को लेकर मृगांकवती से मिलने की इच्छा से धीरदत्त ने मथुरा में प्रवेश किया ॥१६८॥ नगर में जाने पर सिपाहियों ने उन कपड़ों और उसकी गाँठ में बँधे हुए चोरी के हार को पाकर धीरदत्त को पकड़ लिया और उसे सामान के सहित नगराधिपति के सामने उपस्थित किया ॥१६९॥ इसने (नगराधिपति ने) राजा से निवेदन किया और राजा ने उसे (धीरदत्त को) फाँसी के लिए सिपाहियों को आदेश दे दिया ॥१७०॥ पीछे-पीछे बज रही ढग-ढगी के साथ फाँसी के स्थान पर ले जाये जाते हुए धीरदत्त को देखकर मृगांकवती ने राज्य के उस दूसरे मुख्यमन्त्री से जिसके घर में वह ठहरी थी, जाकर कहा कि 'मेरा पति फाँसी पर लटकाने के लिए ले जाया जा रहा है' ॥१७१-१७२॥ २