कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextद्वितीय लम्बकः १६७ महाराज ! वह खड्ग और महागिरि नाम का हाथी—ये दो उस राजा के उसी प्रकार के अमूल्य रत्न हैं जिस प्रकार इन्द्र के पास वज्र और ऐरावत हाथी। इन दोनों के प्रभाव से अत्यन्त सुखी राजा चंडमहासेन एक बार शिकार खेलने के लिए घोर जंगल में गया। वहाँ उसने सहसा बहुत लम्बा-चौड़ा एक भीषण शूकर को देखा जो दिन में सिमटे हुए रात के अन्धकार के गोले के समान प्रतीत हो रहा था ॥४२-४४॥ वह शूकर, राजा के तीक्ष्ण बाणों से विद्ध होकर भी आहत न हुआ और राजा के रथ को टक्कर मारकर एक बिल में जा घुसा ॥४५॥ राजा क्रोध से भरकर और रथ को छोड़कर उसका पीछा करता हुए धनुष के साथ उसी बिल में चला गया ॥४६॥ बिल में दूर तक जाकर राजा ने एक सुन्दर सजा हुआ नगर देखा। थका हुआ राजा विश्राम के लिए वहाँ एक बावली के तट पर जा बैठा। राजा ने उस बापी में अनेक सहेलियों के साथ स्नान करती हुई एक सुन्दरी कन्या को देखा जो धैर्य को नष्ट कर देनेवाले कामदेव के एक बाण के समान थी ॥४७-४८॥ वह सुन्दरी अपनी दृष्टि से प्रेम-रस बरसाकर मानों राजा को स्नान कराती हुई और रोती हुई राजा के पास आई और बोली—'हे सौभाग्यशालिन् ! तुम कौन हो ? और इस समय यहाँ किसलिए आये हो ? यह सुनकर राजा ने उससे सारी सच्ची बात कह दी। राजा की बातें सुनकर, उस सुन्दरी ने आँखों से अविरल अश्रु-धारा और हृदय से धैर्य को एक साथ ही छोड़ दिया। 'तुम कौन हो और क्यों रो रही हो ? राजा के इस प्रकार पूछने पर कामदेव से प्रेरित वह बाला बोली— 'जो शूकर इस बिल में घुसा है, वह अंगारकसुर नाम का दैत्य है और मैं अंगारवती नाम की उसकी कन्या हूँ। यह अंगारकसुर, वज्र के समान बना हुआ अत्यन्त बलवान् है। जिन राजकुमारियों को तुम यहाँ देख रहे हो इन्हें यह दैत्य राजाओं के महलों से बलपूर्वक छीनकर लाया है। इन्हीं से इसने मेरा परिवार बनाया है ॥४९-५४॥ यह असुर शाप के कारण राक्षस बन गया है। शाप के कारण ही प्यासा और थका हुआ इसने तुम्हें देखकर भी छोड़ दिया है। इस समय वह शूकर-रूप को त्याग कर सो रहा है। सोकर उठते ही वह अवश्य तुम्हें मार डालेगा ॥५५-५६॥ १. कृत्रिम रूपवाले निद्रावस्था में अपने वास्तविक रूप में हो जाते हैं। यह प्राकृतिक नियम है। —अनु.