कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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शक्तियशस् नामक तीन लम्बकों को यथास्थान रख सके। साथ ही इससे काव्य के प्रारम्भिक भाग में इस दृष्टि से कि वह अत्यधिक भारी न हो जाये पूर्णतः आमूल परिवर्तन भी स्पष्टतः आवश्यक हो गया। इसके लिए जिस समाधान का आश्रय लिया गया वह इन तीन लम्बकों को जिनका संबंध राजकुमार के सम्राट् होने से पहले के वृत्तान्तों से है पञ्च नामक लम्बक के प्रथम रखने में तथा पद्मावती और विषमशील नामक दो लम्बकों को जिनका संबंध नायक से न होकर केवल उन कथाओं से था जो उसको सुनाई गई थीं और इसी कारण जिनको औचित्य के साथ एक परिशिष्ट के रूप में रखा जा सकता था ग्रन्थ के प्रारम्भिक विषय से हटा देने में था। पञ्च नामक लम्बक के पहले आनेवाले विषय का क्रम कलापूर्ण ढंग से रक्खा गया है क्योंकि उसमें मुख्यतया प्रासंगिक उपकथाओं से संबंध रखनेवाले लम्बकों को नायक के आकस्मिक होते हुए भी महत्त्वयुक्त कार्यों को देनेवाले लम्बकों के बीच-बीच में रखने का प्रयत्न किया गया है। जैसा कि पाँचवें लम्बक के अनन्तर जिसका संबंध प्रासंगिक कथाओं से है मदनमंचुका (६) नामक महत्त्व का लम्बक दिया गया है। इसके अनन्तर रत्नप्रभा (७) है। अलंकारवती (९) से पहले आनेवाला लम्बक 'सूर्यप्रभ' (८) मूर्त्त केवल उपकथाओं से सम्बन्ध रखता है। आकस्मिक कथाओं से सम्बद्ध शक्तियशस् (१०) सहज ही अलंकारवती के अनन्तर आता है। तदनन्तर वेला (११) शशांकवती (१२) मदिरावती (१३) और पूर्णतः महत्त्वयुक्त पंच तथा महाभिषेक (१४ और १५) आते हैं। तदनन्तर, परिशिष्ट रूप में सुरतमंजरी पद्मावती और विषमशील (१६ १८) दिए हुए हैं। एक लम्बक के वास्तविक विषय में एक परिवर्तन आवश्यक था। क्षेमेन्द्र में और संभवतः मूल ग्रन्थ में भी वेला का संबंध केवल प्रासंगिक उपकथाओं से ही नहीं था उसके अंत में मदनमंचुका के तिरोहित होने का आवश्यक अंश सम्मिलित था। उसी के आधार पर हम अगले लम्बकों में सूचित राजा के शोक को समझ सकते हैं। परन्तु, इस प्रकार का वर्णन रत्नप्रभा अलंकारवती और शक्तियशस् इन लम्बकों के संबंध में सोमदेव की योजना से मेल नहीं खाता था इसी कारण उक्त आवश्यक अंश को हटा देना पड़ा तो भी सोमदेव के लिए अपने क्रम में पंच से पहले के लम्बकों में मदनमंचुका के पहले से ही तिरोहित हो जाने के यत्र-तत्र चिन्हों को हटा देना संभव नहीं था। ¹
जैसा कीथ ने लिखा है कि प्रयत्न करने पर भी सोमदेव एक सुसंघटित ग्रंथ की रचना में सफल नहीं हुए, परन्तु कथासरित्सागर के उत्कर्ष का आधार उसके वस्तु की संघटना पर नहीं है। उसका आधार इस ठोस वस्तुस्थिति पर है कि सोमदेव ने सरस और अकृत्रिम रहते हुए आकर्षक और सुन्दर रूप में ऐसी कथाओं की बड़ी भारी संख्या को प्रस्तुत किया है जो नितान्त विभिन्न रूपों में—मनोविनोदकारक अथवा भयानक अथवा प्रेम-संबंधी अथवा कष्ट और त्रास के अद्भुत दृश्यों के प्रति हममें अनुराग उत्पन्न करने के लिए आश्चर्यजनक अथवा हास्योत्पादक थी
१ कीथ, संस्कृत-साहित्य का इतिहास श्रीमन्मङ्गलदेव शास्त्री कृत हिन्दी-अनुवाद पृ ३१४-३१५।