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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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की विशेषता होती है और सोमदेव इसमें पिछड़े हुए नहीं हैं। सोमदेव की अनेक कहानियां मन पर एक बार छप जाने के बाद फिर नहीं भुलाई जा सकतीं। कहानी के विस्तार और संक्षेप की कला में सोमदेव सिद्धहस्त थे। वे उतने ही परिमित शब्दों का प्रयोग करते हैं जितनों से पाठकों की रुचि का विघात न हो और कहानी का रस भी अच्छी तरह अनुभव में आ सके। जब ११वीं शती में समासबहुला शैली का बोलबाला था उस समय सोमदेव ने जिस शैली का प्रयोग किया उसे देखकर आश्चर्य होता है। उन्होंने मानो बिना समासों के सरल वाक्यों का धड़ल्ले से निर्माण किया है, जैसे— बबन्ध मेखलां भूम्नि हारं च जग्रहस्तने । नूपुरौ करयोस्तस्याः कर्णयोरपि कङ्कणौ ॥ (६१।२६) कहानियों के सम्पुट को वे कितना छोटा बना सकते थे इसका एक नुकीला उदाहरण तूलिक या रूई बेचनेवाले मूर्ख की कहानी है— ध्वस्तोलूखलको देव श्रुणु वच्म्यथ तूलिकम् । मूर्खः कश्चित्पुमांस्तूलविक्रयायापणं ययौ ॥ अशुद्धमिति तत्सस्य न जग्राहार्य कश्चन । तावद्ददर्श तत्राग्नौ हेमविद्वत्प्रशोधितम् ॥ स्वर्णकारेण विक्रीतं गृहीतं ग्राहकेण च। तद् दृष्ट्वापि स तत्तूलमिद्धेऽग्न्योधमज्जडः । भस्मौ चिक्षेप दग्धे च तस्मिंल्लोको जहास्तम् । श्रुतोऽयं तूलिको देव खर्जूरीच्छेदकं शृणु ॥ ६१।२८-३१ ॥ 'हे देव ! पहलों के संबंध में मूर्ख की कहानी कह चुका अब रूईवाले की कहानी सुनिए। कोई मूर्ख रूई बेचने बाजार में गया पर साफ न होने से उसे किसी ने लिया नहीं। तब उसने देखा कि सुनार सोने को आग में तपाकर शुद्ध कर रहा है। उस सोने को सुनार ने बेचा और ग्राहक ने खरीद किया। यह देखकर उसने भी अपनी रूई को साफ करने के लिए आग में डाल दिया। इससे सब लोग उस उल्लू पर हँसने लगे। यह तूलिक की कहानी हुई, अब खजूर काटनेवाले मूर्ख की कहानी सुनें। इस प्रकार की तरंगित शैली में सोमदेव की छोटी कहानियां बड़ी कहानियों के सम्पुट में कटहल के कोयों की तरह भरी हुई हैं। इसी प्रकार गंवार गो-दोहक की कहानी है। उसकी गाय प्रति दिन पच्चीस सेर दूध देती थी। उसके यहां कोई उत्सव होने को हुआ। उसने सोचा कि एक ही बार में उत्सव के लिए सारा दूध दुह लूंगा और महीने भर तक गाय नहीं दुही। उत्सव आने पर जब दुहने बैठा तब उसे दूध की बूंद भी न मिली (६१।४४-४७)। पंचतंत्र के हिरण्यक चूहे, लघुपतनक कौए, चित्रग्रीव कबूतर, मंधरुक कछुए की कहानी भी इसमें लम्बक की ६१वीं तरंग में है जिसे सोमदेव ने प्रज्ञामिष्ठ या व्यावहारिक बुद्धिमानी की कहानी कहा है। ४