कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextद्वितीय लम्बक २१९ 'रात्रि के जागरण और अति मद्यपान से मेरे सिर में वेदना हो रही है'—ऐसा कहकर वह कपड़े के टुकड़े से मस्तक को बाँधकर सो गया ॥१५२॥ इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरा वैश्यपुत्र गया। उसने भी उसी प्रकार दुर्दशा भोगी ॥१५३॥ वह नंगा ही कुट्टिनी के घर पहुँचकर बोला कि चोरों ने मेरी यह दुर्दशा की है ॥१५४॥ वह भी सिर-दर्द का बहाना करके सिर में कपड़ा लपेटकर सो गया ॥१५५॥ इस प्रकार क्रमशः वे चारों वैश्यपुत्र वंचित और अपमानित हुए, किन्तु एक दूसरे से अपनी व्यथा छिपाता ही रहा ॥१५६॥ वे इस प्रकार दुर्मति और धन-नाश होने से अत्यन्त लज्जित थे। उन्होंने उस कुट्टिनी परिव्राजिका से भी यह बात प्रकाशित नहीं की और उसके घर से अपने घर चले गये ॥१५७॥ उनके चले जाने पर वह परिव्राजिका कुट्टिनी भी सफल-मनोरथ होने के कारण अपनी धूर्त शिष्या सिद्धिकरी के साथ अभिनन्दन करने के लिए देवस्मिता के घर पर गई ॥१५८॥ देवस्मिता ने भी उसका भलीभाँति स्वागत करके मानों प्रसन्नता और सन्तोष प्रकट करने के लिए धतूरे के चूर्ण से मिला हुआ वही मद्य खूब पिलवाया ॥१५९॥ उसके पश्चात् मद्यपान से उन्मत्त उस कुट्टिनी और उसकी शिष्या के भी नाक-कान कटवा कर उन्हें उसी मल-कुण्ड में फेंकवा दिया जिसमे वैश्यपुत्रों को फेंका गया था ॥१६०॥ देवस्मिता ने इस भय से कि 'वे लज्जित और अपमानित वैश्यपुत्र अपने देश जाकर बदला लेने के लिए मेरे पति को मार न डालें' इसलिए उसने यह सारा वृत्तान्त अपनी सास को सुना दिया ॥१६१॥ तब सास ने कहा—'बेटी ! तुमने बहुत अच्छा कार्य किया। किन्तु इस कांड से मेरे पुत्र (तुम्हारे पति) को हानि हो सकती है ॥१६२॥ तब देवस्मिता ने कहा—"जैसे पहले समय में शक्तिमती ने अपने पति की रक्षा की थी उसी प्रकार मैं भी 'उनकी' रक्षा करती हूँ" ॥१६३॥