कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextद्वितीय लम्बक २३३ उसका यह उत्तर सुनकर ब्राह्मणी सौगन्ध खाकर नम्रतापूर्वक उससे बोली—'अब मैं ऐसा न करूँगी। तुम मेरे पति को प्रसन्न करा दो। तब वह बालक बोला—'जब मेरे पिता आयें तब तुम्हारी दासी उसे एक शीशा दिखाये उसके बाद मैं सब कर दूँगा ॥५२-५३॥ उसकी विमाता ने दासी को इसके लिए तैयार किया। फलतः उसने यज्ञशर्मा के आते ही उसे शीशा दिखलाया ॥५४॥ उसी समय शीशे में अपने पिता के प्रतिबिम्ब को दिखाते हुए बालक ने कहा—'यही मेरा दूसरा पिता है' ॥५५॥ बालक की बात सुनकर ब्राह्मण शंका-रहित हो गया और निष्कारण दूषित अपनी पत्नी के प्रति प्रसन्न हो गया ॥५६॥ 'इस प्रकार एक बच्चा भी बिगड़कर दोष उत्पन्न कर सकता है'। अतः हम लोगों को इन सभी बालकों को प्रसन्न रखना चाहिए ॥५७॥ ऐसा कहकर रुमण्वान् के साथ यौगन्धरायण ने वत्सराज के विवाहोत्सव में सम्मिलित समस्त जनों का सावधानी से ऐसा स्वागत किया कि प्रत्येक व्यक्ति यही समझता कि सारा प्रबन्ध मेरे ही लिए हो रहा है ॥५८॥ अन्त में राजा ने यौगन्धरायण रुमण्वान् और वसन्तक को स्वयं उत्तमोत्तम वस्त्र आभूषण इत्र पान और ग्राम दान (जागीर) करके सादर पुरस्कृत किया (इनाम बाँटे) ॥५९॥ विवाह हो जाने पर वासवदत्ता से युक्त वत्सराज ने इसे अपने मनोरथों का फल समझा ॥६०॥ चिरकाल की प्रतीक्षा के उपरान्त उमड़ा हुआ उनका प्रेम प्रातःकाल के समय रात-भर के सन्तप्त चकवा-चकवी के समान सुखद हुआ ॥६१॥ उस दम्पती का प्रेम जैसे-जैसे प्रौढ़ होता गया वैसे-वैसे उसमें नवीनता आती गई ॥६२॥ गोपालक भी विवाहकर्त्ता पिता का सन्देश पाकर वत्सराज से पुनः आने का निश्चय करके उज्जयिनी चला गया ॥६३॥ चंचल वृत्तिवाला वत्सराज रतिवास की विरचिता नाम की दासी से गुप्त प्रेम करता था। अतः कभी भ्रम में उसका नाम लेने के कारण कुपित वासवदत्ता के चरणों पर गिरकर उसे प्रसन्न करता हुआ और उसके आँसुओं से सींचा जाता हुआ अपने को सौभाग्य-साम्राज्य में अभिषिक्त समझता था ॥६५-६६॥ ३