कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextतृतीय लम्बक १५१ दम्भोलि से इस प्रकार का उदाहरण सुनकर यौगन्धरायण फिर बोला कि अपनी कार्यसिद्धि का ध्यान रखते हुए राजा लोग कष्टों को सहन करते हैं। रावण के विनाश के लिए देवताओं द्वारा सीता से वियुक्त किये गये राम ने कितनी भीषण विरह-वेदना सहन की थी। ऐसा सुनकर दम्भोलि फिर भी बोला—वे राम आदि राजा देवता थे मनुष्य नहीं अतः उनका मन वियोग को सहन कर सकता था किन्तु मानव-हृदय उसे सहन नहीं कर सकता इसपर एक कथा सुनो—॥८१-८४॥ यशस्कर सेठ की कथा इस देश में अनेक रत्नों से पूर्ण मथुरा नाम की महानगरी है। उसमें 'यशस्कर' नाम का एक वैश्य-पुत्र था। उसकी स्त्री उसके प्रति अत्यन्त अनुरक्त थी॥८४-८५॥ उसके साथ रहते हुए उसे आवश्यक कार्य के कारण वैश्य-पुत्र दूसरे द्वीप को जाने को उद्यत हुआ। उसकी प्यारी पत्नी भी उसके साथ जाने के लिए तैयार हुई। कारण यह कि प्रेमपूर्ण स्त्रियों का हृदय पति के विरह को सहन नहीं कर सकता॥८६-८७॥ वह वैश्य-पुत्र मंगलाचरण करके यात्रा के लिए चल पड़ा किन्तु जाने के लिए तैयार बैठी हुई पत्नी को साथ न ले गया। उसकी पत्नी जाते हुए पति को आंसुओं से पूर्ण नेत्रों से देखती हुई गृह-द्वार के किवाड़ के सहारे लटककर खड़ी रही। धीरे-धीरे उसके अंगों से ओझल हो जाने पर वियोग को सहन न कर सकने के कारण वह गिर पड़ी और मानों भय से उसके प्राण निकल गये॥८८-९०॥ वैश्य-पुत्र यह जानकर पीछे लौटा और उसने वियोग-व्याकुल अनाथ निर्जीव पत्नी को देखा॥ ९१॥ भूमि पर निर्जीव पड़ी हुई उसके पीले मुख पर सुगन्धा लेप रही थी। इस प्रकार स्थित हुई उसकी सुन्दर कान्ति लटक रही थी। ऐसा मालूम होता था कि मानो चन्द्रमा की समस्त शोभा भी मान के कारण पृथ्वी पर गिर पड़ी हो॥ ॥ वैश्य-पुत्र उसे अपनी गोद में सुला लिया और रोने लगा। जोर-जोर उसकी श्वासानि के तपते हुए शरीर से मानो भयभीत प्राण-पवन निकल भागे कि कहीं हम भी अन्दर ही जलकर भस्म न जायें॥ ३॥ इस प्रकार परस्पर के विरह से वह दम्पती मर गया। इसीलिए सच्चा स्नेही और परस्पर वियोगियों से भी रक्षा करनी होती॥९४॥ मन्त्रिवित् दम्भोलि के इस प्रकार कहने पर धैर्य-भण्डार यौगन्धरायण बोला—वीर पुरुष का स्वभाव निष्ठा है। राजाओं के साथ ऐसा ही होता है। इस प्रसंग में कथा सुनो—॥ ९५-९६॥