कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextतृतीय लम्बक ३१५ इस कारण व्याकुल मन्त्रिव्रन्द इस घटना को अनिष्ट समझ कर सेनाओं के साथ उज्जयिनी लौट आये ॥१३-१४॥ वहाँ आकर नगर-रक्षा के घेरे (परकोटे) के द्वारों को बन्द करके और उनकी रक्षा का प्रबन्ध करके प्रजा को आश्वासन देते रहे। उधर वह घोड़ा सरपट दौड़ता हुआ राजा को भीषण सिंहों से भरे हुए विन्ध्याचल के घोर जंगल में ले गया। दैवयोग से उस घोड़े के सहसा रुकने पर राजा को चारों ओर दृष्टि फैलाने पर, दिशाओं का ज्ञान न रहा और वह भूख से व्याकुल हो गया ॥१५-१७॥ ऐसे समय कोई चारा न देखकर घोड़ों की नस्ल का जाननेवाला राजा घोड़े से नीचे उतर पड़ा और उसे प्रणाम करके बोला—हे ईश्वर ! तुम घोड़े नहीं वास्तव में देवता हो तुम्हारे ऐसे उच्च जाति के घोड़े स्वामी-द्रोह नहीं करते। यहाँ पर तुम ही मेरी शरण (रक्षक) हो। इसलिए मुझे कल्याण-मार्ग से ले जाओ। पूर्वजन्म का स्मरण करता हुआ घोड़ा मन में पछताता हुआ राजा की बात मान गया। उच्चैः (कुलीन) घोड़े सचमुच देवता ही होते हैं ॥१८-२ ०॥ तब राजा के पुनः सवार होने पर वह घोड़ा स्वच्छ शीतल जल से भरे हुए और मार्गों श्रम को दूर करनेवाले रास्ते से चला ॥२१॥ सायंकाल तक चार सौ कोस की दूरी पर उज्जयिनी के समीप उसने राजा को पहुँचा दिया ॥२२॥ सायंकाल होने पर जबकि अँधेरा फैलने लगा उज्जैन नगर के द्वार बन्द हो गये और उस घोड़े के वेग से अपने घोड़ों के पराजित हो जाने की लज्जा से मानो सूर्य के अस्ताचल की कन्दरा में छिप जाने पर वह घोड़ा नगरी के बाहर रात में भीषण दीखनेवाले श्मशान में राजा को ले गया। बुद्धिमान् घोड़ा राजा को ठहराने के लिए श्मशान के समीप एक ब्राह्मण के शून्य मठ में ले गया ॥२३-२५॥ राजा ने उस मठ को रात बिताने के योग्य देखकर उसमें प्रवेश किया राजा का घोड़ा थक गया था ॥२६॥ यह श्मशान का रक्षक सिपाही है या चोर है ऐसा कहकर उस मठावासी ब्राह्मण ने राजा को अन्दर जाने से रोका ॥२७॥