कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextचतुर्थ लम्बक ४४९ विवाह हो जाने पर सब लोगों के देखते-ही-देखते मेरी पत्नी का वाहन सिंह पुरुष बन गया॥१३४॥ उसका यह परिवर्तित रूप देखकर वहाँ बैठे हुए सभी लोगों के विस्मित हो जाने पर, दिव्य वस्त्र और आभूषण पहने हुए वह मुझे प्रणाम करता हुआ इस प्रकार कहने लगा—॥१३५॥ मैं चित्रांगद नामक विद्याधर हूँ और यह प्राणों से भी अधिक प्यारी मेरी कन्या है॥१३६॥ मैं इसे गोद में लेकर सदा जंगलों में घूमता रहता था। एक बार अनेक तपोवनों से अलंकृत तटोंवाली गंगा के समीप पहुँचा॥१३७॥ तपस्वियों का लंघन न हो इस भय से मैं तट से न जाकर उसके मध्य से जा रहा था। मेरे जाते हुए दैवयोग से मेरी पुष्पमाला गंगा में गिर पड़ी। वह पुष्पमाला जल के अन्दर गोता लगाते हुए नारदजी की पीठ पर गिरी। फलतः इससे क्रुद्ध होकर नारदमुनि ने उस समय मुझे शाप दिया कि 'हे पापी! तूने मेरे साथ उद्दण्डता की है। इसलिए जा तू सिंह बनेगा और हिमाचल में जाकर इस कन्या को पीठ पर वहन करता रहेगा॥१३८-१४०॥ जब यह कन्या मनुष्य से अपना विवाह कर लेगी तब यह देखकर ही तू शाप से मुक्त हो जायगा॥१४१॥ इस प्रकार नारदमुनि से शापित होकर मैं हिमाचल में सिंह बनकर शिव-पूजन में रत इस कन्या को वहन करता रहता था॥१४२॥ इसके पश्चात् भीमराज के प्रयत्न से यह सब जो कुछ मङ्गलमय घटना हुई, वह सब आपको विदित ही है॥१४३॥ अतः अब मैं स्वर्ग-लोक को जाता हूँ। तुम लोगों का कल्याण हो। मैं शाप से मुक्त हो गया हूँ। ऐसा कहकर वह विद्याधर तुरन्त आकाश में उड़ गया॥१४४॥ उस सिंह द्वारा आश्चर्यमन्वित और प्रसन्न बन्धुजनोंवाले एवं उच्चकोटि के विद्याधर के साथ हुए सम्बन्ध से उत्साहित और प्रसन्न मेरे पिता ने मेरे विवाह का महान् उत्सव मनाया॥१४५॥ अपने प्राणों से उपकार करने पर भी जो उपकारी मित्र सन्तुष्ट नहीं होते ऐसे मित्रों के चरित्र को कौन शोध या समझ सकता है। इस प्रकार भीमराज के उदारतामय चरित्र की चारों ओर चर्चा चलती रही॥१४६-१४७॥ वरुथी के राजा भी उसकी अतिशय उदारता की कथा सुनकर सन्तुष्ट हुए और मेरे पिता ने बहुमूल्य रत्नों का उपहार देकर और प्रत्युपकार के रूप में उसे वरुथी के राजा की ओर से जंगल का राज्य दिला दिया॥१४८-१४९॥ ५७