कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextचतुर्थ लम्बक ४५९ अतः नागवध के उसी क्रम में आज मेरी बारी है। मेरा नाम शंखचूड़ है। मैं भी नागराज की आज्ञा से आज गरुड़ के आहार के लिए इस वध्यशिला पर लाया गया हूँ। अतः मैं माता के लिए शोचनीय हो रहा हूँ। इस प्रकार शंखचूड़ के वचन सुनकर और उसके मुख से दुःखी जीमूतवाहन धैर्यपूर्वक उससे बोला—॥२८-२१॥ अहो ! वासुकि का नागराज होना कितना सारहीन है, जो स्वयं अपने हाथों से अपनी प्रजा को शत्रु का आमिष (भोजन) बना रहा है॥२११॥ क्यों नहीं उसने सबसे पहले अपने को ही गरुड़ के लिए प्रदान किया। प्रत्युत इसके विपरीत ही नपुंसक के समान उसने अपने कुल का ही नाश स्वीकार किया॥२१२॥ उधर, गरुड़ भी कश्यप ऋषि की सन्तान होकर कितना पाप कर रहा है। महान् पुरुषों को भी इस देह के लिए कितना मोह है॥२१३॥ इसलिए आज मैं तुम एक नाग की अपना शरीर-दान करके रक्षा करता हूँ। तुम व्यर्थ शोक न करो॥२१४॥ यह सुनकर शंखचूड़ भी धैर्य के साथ बोला—हे महात्मन् ! ऐसा फिर न कहना॥२१५॥ काँच के लिए मोती की हानि करना उचित नहीं है। मैं भी कुल-कलंक बनना नहीं चाहता'॥२१६॥ ऐसा कहकर और जीमूतवाहन को रोककर वह सज्जन नाग शंखचूड़ तुरन्त आनेवाले गरुड़ के समय को जानकर समुद्रतीरवासी गोकर्ण नामक शिव को अन्तिम समय का प्रणाम करने के लिए गया। उसके जाने पर दयानिधि जीमूतवाहन को उसकी रक्षा के लिए अपना प्राणदान करने का अवसर मिल गया॥२१७-२१९॥ तब उसने पुलिन में माँ त्रिशिखी की बात का स्मरण करके किसी काम के बहाने से अपने साथी मित्रावसु को वहाँ से भेज दिया॥२२०॥ उसी समय समीप आये गरुड़ के पंखों की वायु से काँपती हुई भूमि मानो उस महापुरुष के दर्शन से आश्चर्यचकित हो घूमने लगी॥२२१॥ इस लक्षण से परोपकारी जीमूतवाहन गरुड़ का आया हुआ जानकर उस वध्यशिला पर चढ़ गया॥२२२॥