कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextचतुर्थ लम्बक ४३१ अपने विशालपंखों की छाया से आकाश को छाये हुए गरुड़ ने चोंच मारकर उस महाप्राणी जीमूतवाहन को उठा लिया॥२२३॥ बहती हुई रक्तधारावाले और उखड़कर गिरी हुई सिर की मणिवाले जीमूतवाहन को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर उसका भक्षण करने लगा॥२२४॥ इसी समय आकाश से पुष्पवृष्टि हुई। गरुड़ भी यह क्या है ऐसा सोचकर आश्चर्य चकित हो गया॥२२५॥ इतने में ही वह शंखचूड़ भी गोकर्णेश्वर शिव को प्रणाम करके आ गया और उसने वध्यशिला को रक्त से सचंप पाया॥२२६॥ और सोचने लगा कि धिक्कार है मुझे। उस महात्मा ने निश्चय ही मेरे लिए जीवन-दान दिया है। गरुड़ इस समय उसे कहाँ ले गया होगा॥२२७॥ मैं उसे शीघ्र खोजता हूँ। सम्भव है, मैं उसे प्राप्त कर लूँ। ऐसा सोचकर वह सज्जन रक्त की धारा के पीछे-पीछे चला॥२२८॥ उधर, जीमूतवाहन को प्रसन्न देखकर गरुड़ ने उसका भोजन करना छोड़ दिया और आश्चर्यान्वित हो उसे देखने लगा॥२२९॥ 'यह नाग नहीं कोई दूसरा ही जीव है, जो मेरे खाये जाने पर भी मरता नहीं प्रत्युत इसके विपरीत प्रसन्न हो रहा है' ॥२३०॥ इस प्रकार मन में सोचते हुए गरुड़ को अपनी दृष्टिसिद्धि के लिए जीमूतवाहन बोला—॥२३१॥ 'हे पक्षिराज ! अब भी मेरे शरीर में मांस और रक्त है। फिर भी तुम बिना तृप्त हुए ही खाने से सहसा क्यों रुक गये हो ? ॥२३२॥ यह सुनकर आश्चर्यचकित गरुड़ ने पूछा—हे सज्जन तुम नाग नहीं बताओ कौन हो ? ॥२३३॥ 'मैं नाग ही हूँ तुम खाओ। जो प्रारम्भ किया है, उसे समाप्त करो। महान् व्यक्ति किसी कार्य को जिसको आरम्भ किया हो समाप्त किये बिना नहीं छोड़ते'॥२३४॥ जीमूतवाहन जबतक ऐसा कह ही रहा था तबतक शंखचूड़ दूर से चिल्लाकर बोला—॥२३५॥ 'हे गरुड़ ! इसे मत खाओ मत खाओ। यह नाग नहीं है, तुम्हारा भक्ष्य नाग मैं हूँ। तुम्हें यह सहसा भ्रम कैसे हो गया। इसे छोड़ दो'॥२३६॥ यह सुनकर पक्षिराज गरुड़ अत्यन्त व्याकुल हो गया और जीमूतवाहन को अपनी अभीष्ट सिद्धि न होने का खेद हुआ॥२३७॥