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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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चतुर्थ लम्बक ४१९ पत्नी के ऐसा कहने पर उसके पति ने कहा—'महाराज ! अपने भाई-बन्धुओं के साथ मुझे मार डालना चाहती हुई यह स्त्री झूठ बोलती है। एक वर्ष पर्यन्त मैंने इसे भोजन वस्त्र आदि सब कुछ दिया है। इसके सभी भाई-बन्धु तथा और भी निष्पक्षपात व्यक्ति इस बात के साक्षी हैं ॥१९-२०॥ इस प्रकार उससे निवेदित राजा स्वयं बोला—'इस बात का साक्ष्य रानी के स्वप्न में भगवान् शिवजी ने स्वयं किया है, तो अब और दूसरे साक्षियों की क्या आवश्यकता है। अतः इस दुष्टा स्त्री को बन्धु-बान्धवों सहित पकड़कर कैद कर लेना चाहिए ॥२१॥ राजा के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् मन्त्री यौगन्धरायण ने कहा—॥२२॥ महाराज ! यह तो ठीक है। फिर भी, नियमानुसार साक्षियों की बातों पर ही यथो- चित दंड दिया जाना चाहिए; क्योंकि जनता स्वप्न की बात को न जानती हुई इस समुचित न्याय पर कैसे विश्वास करेगी ॥२२-२३॥ यह सुनकर और यौगन्धरायण की सम्मति को उचित मानकर राजा ने साक्षियों को बुला कर साक्षी ली। सभी ने उस स्त्री को झूठी बताया ॥२४॥ तब राजा ने उस स्त्री के लिए बन्धुओं के साथ सज्जन पति के द्रोह का अपराध लगाकर पुत्रों और बन्धुओं के साथ देश-निकाले का दंड दिया ॥२५॥ और उसके सज्जन पति का आदर कर दयालु राजा ने उसका दूसरा विवाह करने के लिए स्वयं प्रचुर द्रव्य भी उसे दिया ॥२६॥ सच है क्रूर और कुलटा स्त्रियां दुर्बलापरत्न एवं व्याकुल पतियों को जीते-ही जीते कौवियों के समान नोच खाती हैं ॥२७॥ वृक्ष की छाया के समान स्नेहपूर्ण सुशीला उदारहृदया सुगृहिणी और सन्मार्ग स्थित पत्नी किसी को ही बड़े पुण्यों से प्राप्त होती है ॥२८॥ इस प्रकार कहते हुए राजा के समीप बैठा हुआ कथा कहने में निपुण विदूषक वसन्तक बोला—॥२९॥ महाराज ! एक बात और भी है कि मनुष्य में परस्पर स्नेह या विराग प्रायः पूर्व जन्म के संस्कार से ही होता है ॥३०॥ मैं इस सम्बन्ध में एक कथा की कहानी सुनाता हूँ, उसे सुनो ॥३१॥ निहिश्चय और उसकी कलहकारिणी भार्या की कथा किसी समय वाराणसी नगरी में विषमशील नाम का एक राजा था। उसका सिंह- विक्रम नाम का एक प्यारा सेवक था, जो दण्ड में और जुआ खेलने में अतिनिपुण था ॥३२-३३॥

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