कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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इस प्रकार तप का मान करने से उस शुभ फल प्राप्त होते हैं। इसलिए मैंने माता पिता के साथ राज्य प्राप्त करके शूर्पारक का भी स्मरण किया॥१०६॥ इस प्रकार रानी तारावली की बातें सुनकर पर्यन्तग राजा रतिदत्त ने कहा — यह सच है। अनीति से दिया गया थोड़ा भी फल महान् फल देनेवाला होता है। इस सम्बन्ध में सात ब्राह्मणों की एक कथा सुनाता हूँ सुनो॥१०७-१०८॥ सात ब्राह्मणों की कथा कुरुङ्गार नामक नगर में किसी उपाध्याय (अध्यापक) ब्राह्मण के सात ब्रह्मचारी शिष्य थे॥१०९॥ एक बार दुर्भिक्ष पड़ने पर उस अध्यापक ने उन सातों शिष्यों को अन्न लानेके आत्म श्वशुर के घर अन्न संग्रह के लिए अपनी ससुराल भेजा॥११०॥ दुर्भिक्ष से मृत प्रायः उन सातों शिष्यों ने गुरु के कथनानुसार गुरु ससुराल से जाकर गाय माँगी॥१११॥ तब कुल और वंश के प्रभाव से अपनी जीविका की सम्भावनायुक्त उस गाय को अपने लिए किन्तु गुरुवर के लिए नहीं पूछा॥११२॥ वे सातों शिष्य उस गाय को लेकर गुरु के आश्रम की ओर आते हुए रास्ते में थककर बैठ गये! ...॥११३॥ और भूख से व्याकुल उन सातों ने उस गाय को मारकर खाने का निश्चय किया॥११४॥ उनमें से सबसे छोटे भाई ने कहा—गाय हमारी माता है, अतः इसे मारना ठीक नहीं है। शिष्यों ने अपने लिये ही उसके भूखे होने पर उस गाय को मारकर खाने का विचार करके उस गाय को मार डाला और उसका मांस आपस में बाँटकर खा लिया॥११५॥ उस छोटे भाई ने मांस नहीं खाया केवल उसके एक अंश की रक्षा की॥११६॥ समय बीतने पर वे सातों भाई मरकर मृग की योनि में उत्पन्न हुए॥११७॥ वहाँ भी वे सातों भाई साथ-साथ रहे और पूर्वजन्म के पाप के कारण कष्ट भोगते रहे॥११८॥