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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक १२१ हाँ आखेट का अधिक सेवन भी हानिकारक होता है। इसके अधिक सेवन या व्यसन से ही पांडु आदि पूर्व राजाओं का विनाश हुआ है॥१४८॥ इस प्रकार बुद्धिमान् मन्त्री अमरगुप्त द्वारा कहे गये राजा विक्रमसिंह ने उसे स्वीकार किया॥१४९॥ दूसरे दिन ही वह राजा पृथ्वी को घुड़सवार, पैदल सिपाही और शिकारी कुत्तों से दिशाओं को विभिन्न जालों और मचानों से एवं आकाश को प्रक्षप्रचित बहेलियों के शब्दों से भरता हुआ शिकार के लिए नगरी (उज्जयिनी) से बाहर निकला॥१५०-१५१॥ हाथी पर बैठकर जाते हुए उस राजा ने नगर के बाहर सूने शिवालय में एक साथ एकान्त में खड़े दो मनुष्यों को देखा॥१५२॥ वे दोनों आपस में कुछ मन्त्रणा करते हुए-से खड़े थे। उन पर दूर से ही सन्देह करता हुआ राजा आखेट-वन (शिकारगाह) में गया॥१५३॥ वहाँ जाकर राजा ने तलवार से काटे हुए बूढ़े बाघों तथा सिंहों के गर्जनों से पूरित जंगली स्थानों और पहाड़ों में सन्तोष प्रकट किया॥१५४॥ राजा ने हाथियों को मारनेवाले सिंहों के नखों से गिरे हुए पराक्रम के बीजों के समान मोतियों से सारी जंगली भूमि भर दी॥१५५॥ टेढ़े-टेढ़े उछलनेवाले मृग उससे दिशा माप रहे थे। किन्तु राजा बिना टेढ़ा हुए ही उन्हें शीघ्रता से बींधता हुआ अपनी शस्त्रविद्या पर हर्ष प्रकट करता था॥१५६॥ बहुत समय तक आखेट करके शान्त सेवकों के साथ डोरी सहारे डाले गये मगृण को लेकर वह राजा उज्जयिनी को लौटा॥१५७॥ लौटते हुए उसने उसी देवमन्दिर में इतने समय तक उसी प्रकार खड़े-खड़े बातें करते हुए उन दोनों मनुष्यों को फिर से देखा जिन्हें जाते समय देखा था॥१५८॥ ये दोनों कौन हैं और इतने समय तक क्या मन्त्रणा कर रहे हैं इतनी लम्बी और गुप्त मन्त्रणा करनेवाले ये अवश्य ही कोई गुप्तचर होंगे॥१५९॥ ऐसा सोचकर और द्वारपाल को भेजकर राजा ने दोनों को पकड़वाकर बँधवा दिया। तदनन्तर दूसरे दिन उन्हें दरबार में बुलाकर पूछा-'तुम कौन हो। और इतने लम्बे समय तक वहाँ क्या मन्त्रणा करते रहे? ॥१६०-१६१॥ उन दोनों के अभय प्रार्थना करने पर एक युवक इस प्रकार कहने लगा-'सुनो महा राज ! आपकी इसी नगरी म शरभदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था॥१६२-१६३॥