कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in context'हे मंडूक, भांप-भांपे और विवश तेरे नाश के लिए यह चर्म कारण हुआ' ।।१३५।। यह सुनकर प्रसंग की ओर अख लगाकर वहाँ उपस्थित पुरुषों ने कहा—'ओह ! यह तो महान् ज्योतिषी है। इसने मण्डूक को भी जान लिया' ।।१३६।। तब प्रसन्न राजा ने उसके कथन को प्रतिभा प्रसूत ज्ञान समझकर थान के छत्र हाथी घोड़े आदि के साथ ग्राम भी भेंट किए ।।१३७।। क्षण-भर में वह हरिशर्मा सामन्त राजा के समान हो गया। १ दैव अच्छे कर्मवालों के साथ स्वयं ऐसे ही मिल कर बैठता है ।।१३८।। इसलिए दैव ने इस कन्या को भीमदत्त के पास उचित ही अभिगमन करा दिया और अयोग्य व्यक्ति को भी हटा दिया ।।१३९।। मन्त्री के मुँह से इस प्रकार कथा सुनकर विक्रममत्त ने धरणी के समान अपनी कन्या राजपुत्र सामदत्त को दे दी ।।१४० ।। तदनन्तर सामदत्त भी श्वशुर की सेना के बल से शत्रुओं पर चढ़ाई करके और उन्हें जीतकर अपने राज्य में अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा ।।१४१।। हे कलिङ्गसेने दैवगति की विशेषता से ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं। अतः ऐसी सुन्दरी तुझे वत्सेश्वर से मिलाने में दैव के सिवा और कौन समर्थ है। मैं इस विषय में क्या कर सकती हूँ ।।१४२।। इस प्रकार, सोमप्रभा के मुख से एकान्त में कथा सुनकर बन्धुओं के भय और लज्जा को छोड़कर कलिङ्गसेना वत्सराज के समागम के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित हो गई ।।१४३।। तदनन्तर त्रिभुवन के एकमात्र दीपक सूर्य के अस्त हो जाने पर, प्रातःकाल पुन आने की अवधि प्रदान करके मयासुर की पुत्री सोमप्रभा अभीष्ट-सिद्धि के लिए उद्यत सखी कलिङ्गसेना से पूछकर आकाश-मार्ग से घर को चली गई ।।१४४।। चतुर्थ तरङ्ग समाप्त
१ इस कथा से मिलती-जुलती कहानी, ग्रीस की 'परियों की कहानी' में भी है। बेनफी का कथन है कि योरप में प्रचलित ऐसी कहानियों का मूल स्रोत कथासरित्सागर ही है।—अनु