कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७१७ इस समय कलिङ्गसेना की स्वीकृति को भी सादर मान लेना। यह भी कहना कि उसके पिता कलिङ्गरत राजा की सहायता से राज्य की वृद्धि ही होगी ॥८९॥ ऐसा करने पर तुम्हारे हृदय की उदारता और महत्ता से बढ़ हुए स्नेहवाला राजा तुम्हारी ओर आ जायगा ॥९०॥ और कलिङ्गसेना को स्वाधीन (स्वतन्त्र) समझकर उसके प्रति वह उत्सुक न होगा। विषयों से रोके जाते हुए व्यक्ति की इच्छा विषयों की ओर ही अधिक दौड़ती है ॥९१॥ रानी पद्मावती को भी इसी प्रकार, शिक्षा देना। इस प्रकार, तुम लोगों से सँभाला हुआ राजा हमारे द्वारा किये जाते हुए विलम्ब को सहन कर लेगा ॥९२॥ इससे अधिक मैं नहीं जानता। अब मेरी बुद्धि का बल देखो। सङ्कट-काल में बुद्धिमान् और युद्ध-काल में शूरवीर की परीक्षा होती है ॥९३॥ इसलिए हे देवि खिन्न न होओ। इस प्रकार, रानी को समझाकर और अपनी बातों का समर्थन प्राप्त कर यौगन्धरायण चला गया ॥९४॥ स्वयंवर के रस से अभिभूत होकर बालवाली ऐसी कलिङ्गसेना के प्रथम समागम के लिए उत्कण्ठित चित्तवाला वत्सराज उस दिन न दिन में और न रात में ही किसी भी रानी के भवन में गया ॥९५॥ और उधर, कलिङ्गसेना ने भी यह रात दुर्लभ रस प्राप्त करने की उत्सुकता गम्भीर चिन्ता और महोत्सव के स्मरण में व्यतीत की ॥९६॥ पंचम तरङ्ग समाप्त षष्ठ तरंग कलिङ्गसेना की कथा (चालू) मन्त्री यौगन्धरायण का कूटनीति-प्रपञ्च तदनन्तर, दूसरे दिन प्रातःकाल प्रतीक्षा करते हुए वत्सराज से धूर्त (चतुर) मन्त्री यौगन्धरायण ने जाकर निवेदन किया—'महाराज आपके लिए कल्याणदायक कलिङ्गसेना का विवाह-महोत्सव आज ही क्यों न देख लिया जाय' ॥१ २॥