कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextप्रथम लम्बक ४५ उसके आते ही दासियों ने घबराकर उस पुरोहित को भी पहलेवाले सन्दूक में बन्द कर दिया ॥५९॥ पुरोहित के सन्दूक को अर्गला से बन्द कर देने के पश्चात् दासियों ने कोतवाल का भी स्नान के बहाने स्नानागार में ले जाकर उसी प्रकार काजल की मालिश की ॥६०॥ पहले दोनों के समान उन दासियों द्वारा यह कोतवाल भी एक कपड़े का टुकड़ा पहनाकर मूर्ख बनाया गया। इतने में रात्रि के अन्तिम पहर में वह हिरण्यगुप्त नामक बनिया आ पहुँचा ॥६१॥ कोतवाल को वह देख लेगा इस प्रकार का भय दिखाकर दासियों ने उसे भी उसी सन्दूक में बन्द करके बाहर से अर्गला चढ़ा दी ॥६२॥ उस एक ही सन्दूक में वे तीनों मानों अन्धतामिस्र नरक में वास करने का अभ्यास करते हुए-से परस्पर संस्पृष्ट होते हुए भी बोलते न थे ॥६३॥ उपकोशा ने दिया जलाकर और उस बनिये को स्नानागार में ले जाकर कहा—कि मेरे पति का दिया हुआ धन मुझे लौटा दो ॥६४॥ उपकोशा की बातें सुनकर और एकान्त घर को देखकर वह धूर्त बनिया बोला—'मैंने कह दिया कि तुम्हारे पति का रखा हुआ धन मैं अवश्य दे दूँगा' ॥६५॥ उपकोशा ने बन्द सन्दूक को सुनाते हुए कहा—हे देवताओ! हिरण्यगुप्त का वचन सुनो ॥६६॥ ऐसा कहकर उपकोशा ने दिया बुझा दिया और दासियों ने उस बनिये को भी अन्य तीनों के समान स्नान के बहाने से अपक्वतेल का लेप किया ॥६७॥ मर्दन में विस्रम्भ के कारण प्रातःकाल होते ही दासियों ने उससे कहा कि अब जाओ रात समाप्त हो गई। जब उसने जाने में आनाकानी की तो दासियों ने गलहस्त (गर्दभिया) देकर उसे घर से बाहर निकाल दिया ॥६८॥ एक फग चिथड़ा लपेटे हुए घर से निकाले जाने पर काजल से पुता हुआ अतएव कुत्तों से काटा जाता हुआ बनिया अत्यन्त लज्जा के साथ अपने घर पहुँचा ॥६९॥ घर जाकर जब उसके सेवक उसके शरीर की कालिमा छुड़ाने लगे तब तो वह उनके सामने भी मुँह न कर सका। सच है बुरी बातों का परिणाम बुरा ही होता है ॥७०॥ इसके उपरान्त प्रातःकाल दासी को साथ लेकर उपकोशा भी अपने माता-पिता की आज्ञा के बिना ही राजा नन्द के भवन को चली गई ॥७१॥ राजभवन में जाकर उसने राजा से स्वयं निवेदन किया कि हिरण्यगुप्त नामक बनिया मेरे पति द्वारा उसके पास रखे हुए धन को हड़प लेना चाहता है ॥७२॥