कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७२१ मन्त्री के इस प्रकार कहने पर, वह ब्रह्मराक्षस बोला—'मैं किसी उपाय से उसे क्यों न नष्ट कर दूँ या मार डालूँ ? ॥३२॥ यह सुनकर महामन्त्री यौगन्धरायण बोला—'ऐसा न करना चाहिए क्योंकि इससे महान् अधर्म होगा' ॥३३॥ जहाँ धर्म की रक्षा करते हुए मनुष्य अपने इच्छानुसार चलता है या कार्य करता है वहाँ पर धर्म ही उसकी सहायता करता है ॥३४॥ इसलिए मित्र तुम उसके निजी दोष को न देखो जिससे कि मैं तुम्हारी मित्रता के कारण राजा का कल्याण-कार्य सिद्ध कर सकूँ ॥३५॥ मन्त्री द्वारा इस प्रकार आदेश देने पर ब्रह्मराक्षस कलिगसेना के भवन में जाकर छिपकर बैठ गया ॥३६॥ इसी बीच कलिङ्गसेना की सखी मयासुर की पुत्री सोमप्रभा उसके पास फिर आई ॥३७॥ उसके कलिङ्गसेना से रात की बात पूछने पर ब्रह्मराक्षस के सुनते हुए कलिङ्गसेना ने सारा वृतान्त मयासुर की पुत्री को सुनाया जिसे ब्रह्मराक्षस सुन रहा था ॥३८॥ तब सोमप्रभा बोली—'आज मैं दिन के प्रथम प्रहर में ही तेरे पास आ गई थी किन्तु तुम्हारे पास यौगन्धरायण को देखकर छिपी रही ॥३९॥ उस तुम्हारी बातचीत तथा और सब कुछ मैंने जान लिया। मेरे मना करने पर भी तूने हठ ही यह कार्य क्यों कर डाला ? ॥४०॥ बिना समझे-बूझे और बिना कारण जो कार्य किया जाता है उसमें अनिष्ट ही होता है। उदाहरण के लिए इस प्रसंग की एक कथा सुनो' ॥४१॥ विष्णुदत्त और उसके सात साथियों की कथा प्राचीन समय में अन्तर्वेदी देश में समुद्रदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके पुत्र का नाम विष्णुदत्त था ॥४२॥ वह विष्णुदत्त जब पूरे सोलह वर्ष की अवस्था का था तब विद्या-प्राप्ति के लिए वलभीपुरी में जाने के लिए तैयार हुआ। साथ जाने के लिए उसे और भी सात ब्राह्मण-पुत्र मिले। वे सातों मूर्ख थे। केवल विष्णुदत्त ही उनमें बुद्धिमान् और सद्गुणोपेत बालक था ॥४३-४४॥