BharatKosha
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 782 of 876

Read in context
Page 782

तब वे आपस में एक-दूसरे का साथ न छोड़ने की प्रतिज्ञा करके माता-पिता से छिपकर रात में एक साथ ही निकले। चलते ही उनके सामने अकस्मात् अपशकुन हुआ। उसे देखकर विष्णुदत्त ने अपने साथी मित्रों से कहा—'यह अपशकुन है, अतः लौट जाना उचित है। फिर कभी शुभ शकुन मिलने पर कार्यसिद्धि के लिए चलेंगे' ॥४५-४७॥ यह सुनकर उसके सातों मूर्ख साथी उससे कहने लगे—'व्यर्थ चिन्ता न करो। हमलोग ऐसे अपशकुनों से नहीं डरते ॥४८॥ यदि तू डरता है तो मत जा हमलोग अभी जायेंगे। प्रातःकाल हमारा समाचार जान कर घरवाले हमें नहीं छोड़ेंगे' ॥४९॥ ऐसा कहते हुए उन मूर्ख मित्रों के साथ प्रतिज्ञाबद्ध बेचारा विष्णुदत्त पापहारी भगवान् का ध्यान करके उनके साथ चल पड़ा ॥५०॥ रात बीतने पर, प्रातःकाल ही उसने और अपशकुन देखे। फिर उसने उन मित्रों से कहा किन्तु उन हठीले मित्रों द्वारा वह फिर फटकारा गया ॥५१॥ वे कहने लगे कि सबसे बड़ा अपशकुन तो यही है कि मार्ग के डरपोक कौवे के समान तुझे हमलोग साथ लाये ॥५२॥ ऐसी-ऐसी फटकारों को सुनता हुआ विष्णुदत्त जाते हुए उनके साथ चलने को विवश हो गया। सच है, मनमानी करनेवाले मूर्ख को उपदेश देना ऐसा ही है, जैसे कूड़ा-करकट साफ करता हुआ व्यक्ति उसकी धूल-मिट्टी से अपने शरीर को गंदा करके अपना ही तिरस्कार कराता है ॥५३-५४॥ एक बुद्धिमान् व्यक्ति बहुत-से मूर्खों की संगति में पड़कर उसी प्रकार की स्थिति में आ जाता है, जैसे सरोवर में खड़ा हुआ एक कमल तरंगों के थपेड़ों से आहत होकर हिलता ही रहता है ॥५५॥ अतः अब मुझे इनसे हित या अहित कुछ न कहकर चुप ही रहना चाहिए। भाग्य भला करेगा—॥५६॥ ऐसा सोचकर उन मूर्खों के साथ जाते हुए सायंकाल विष्णुदत्त को भीलों का एक गाँव मिला। वहाँ घूम-फिरकर उसे एक युवती स्त्रीवाला घर मिला। तब उसने उस स्त्री से रहने के लिए स्थान माँगा ॥५७-५८॥ उसने एक स्थान उसे दे दिया और उसमें वह अपने सातों मित्रों के साथ ठहर गया। कुछ ही समय में वे सातो मित्र मार्ग की श्रान्ति के कारण सो गये ॥५९॥