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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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एक वही विष्णुदत्त अकेला जागता रहा क्योंकि जिस घर में वह ठहरा था उसमें एक उस युवती के अतिरिक्त दूसरा कोई पुरुष न था। मुग्ध जन निश्चेष्ट होकर सो जाते हैं किन्तु विचारशीलों को नींद कहाँ ? ॥६०॥ इसी बीच कोई एक युवा व्यक्ति छिपे तौर से उस स्त्री की कोठरी में स्त्री के पास गया ॥६१॥ गुप्त रूप से बातें करती हुई वह स्त्री उस पुरुष के साथ रमण करने लगी। कुछ समय पश्चात् रति की श्रान्ति एवं घोर नींद से विवश होकर वे दोनों सो गये ॥६२॥ विष्णुदत्त दरवाजे की दरार से दीपक के प्रकाश से प्रकाशित उस कोठरी में यह सब देखता रहा और दुःखी होकर सोचने लगा—॥६३॥ कष्ट है कि हमलोग इस दुराचारिणी स्त्री के घर में आ गये। निश्चय है कि यह इसका विवाहित पति नहीं है। यदि विवाहित पति होता तो इसकी गति इस प्रकार सशंक और छिपी न होती। मैंने पहले ही समझ लिया था कि यह स्त्री वंचका है। इस प्रकार सोचते-सोचते उसने घर के बाहर कुछ मनुष्यों के शब्द सुने ॥६४-६५॥ उसने अपनी-अपनी जगहों पर तैनात अनुचरों के साथ तलवार लेकर आते हुए भीलों के युवा सरदार को देखा ॥६६॥ 'तुम कौन कौन हो'—ऐसा पूछते हुए भीलराज से विष्णुदत्त ने कहा—'हमलोग पथिक (बटोही) हैं ॥६८॥ तदनन्तर अन्दर आकर और इस प्रकार प्रेमी (जार) के साथ सोई हुई देखकर भीलराज ने पत्नी के उस प्रेमी का सिर तलवार से काट डाला ॥६९॥ किन्तु स्त्री को न मारा और न जगाया। वह तलवार को भूमि पर रखकर पलंग पर सो गया ॥७०॥ दीप से प्रकाशित घर में इस घटना को देखकर विष्णुदत्त ने सोचा इसने उचित ही किया कि स्त्री समझकर पत्नी को नहीं मारा और उसका हरण करनेवाले को मार डाला ॥७१॥ किन्तु यह आश्चर्य है कि ऐसा कर्म करके भी यह विश्वासपूर्वक सो रहा है। बड़े हुए मनवालों का ऐसा पराक्रम अवश्य आश्चर्यजनक होता है ॥७२॥ विष्णुदत्त यह सोच ही रहा था कि उस दुष्टा स्त्री ने जागकर जार को मरा हुआ और पति को सोता हुआ देखा ॥७३॥ और, पलंग से उठकर अपने यार के शव को कन्धे पर रखकर एक हाथ से उसके सिर को लेकर वह घर से बाहर निकली ॥७४॥