कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७२९ बाहर निकलकर राख के ढेर में उसके सिर और शरीर को फेंककर चुपचाप वह लौट आई ॥७५॥ विष्णुदत्त भी सबसे पीछे निकलकर और दूर से यह सब देखकर, अपने सोये हुए मित्रों के साथ सो गया ॥७६॥ उधर उस दुष्टा स्त्री ने घर में आकर उसी तलवार से सोये हुए पति का सिर काट डाला और बाहर निकलकर सेवकों को सुनाकर चिल्लाने लगी— हाय ! मैं मारी गई, इन पथिकों ने मेरे पति को मार डाला' ॥७७-७८॥ यह सुनकर उसके सेवक दौड़कर आये और अपने सरदार को कटा हुआ देखकर, तलवारें खींचकर विष्णुदत्त आदि पथिकों पर टूट पड़े ॥७९॥ 'ठहरो, तुमलोग ब्रह्महत्या न करो। यह सब काण्ड जार से फँसी हुई इसी दुष्टा स्त्री ने किया है ॥८ ॥ 'मैंने प्रारम्भ से अबतक द्वार के खुली हुई दरारों से सब अपनी आँखों से देखा है और बाहर निकलकर भी सब स्वयं देखा है। आप लोग क्षमा करें' तो मैं सब कुछ कहता हूँ ॥८१-८२॥ ऐसा कहते हुए विष्णुदत्त ने सारी बात बताकर कूड़े और राख के ढेर में पड़े हुए उस यार के मृत शरीर और सिर को दिखाया ॥८३-८४॥ तब उतरे हुए मुँह से उस स्त्री के यह सब स्वीकार कर लेने पर वे सब उस दुराचारिणी को डाँटते-फटकारते चले गये ॥८५॥ काम के वशीभूत होकर जो स्त्री निर्मम होकर साहस कर बैठती है वह दूसरो से स्नेहवत् होकर तलवार के समान किसका विनाश नहीं कर डालती ॥८६॥ ऐसा कहते हुए उन भीलों ने विष्णुदत्त आदि सातों ब्राह्मणों को छोड़ दिया और वे सातों साथी विष्णुदत्त की प्रशंसा करने लगे ॥८७॥ उन्होंने कहा— सोये हुए हम लोगों की रक्षा के लिए तुम रत्नदीप के समान सिद्ध हुए। आज अपशकुन से होनेवाली मृत्यु को तुम्हारी कृपा से हमलोग पार कर सके' ॥८८॥ इस प्रकार विष्णुदत्त की प्रशंसा करके और अपने कहे हुए दुर्वचनों के लिए क्षमा-प्रार्थना- पूर्वक उसे प्रणाम करके वे प्रातःकाल अपने काम में लग गये ॥८९॥ ९२