कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextपन्द्रह लम्बक ७३७ मैंने महारानी के आगे एकाएक लम्बी-चौड़ी डींग तो हाँक दी किन्तु ऐसा विधान तो मैं जानती नहीं ॥१३३॥ अन्य साधारण स्थानों के समान राजा के घर में ऐसा छल-कपट करना उचित नहीं क्योंकि रहस्य खुलने पर शक्तिशाली राजा प्राणदंड दे सकते हैं ॥१३४॥ हाँ एक उपाय सूझ रहा है। मेरा मित्र एक नापित (नाई) है वह ऐसे कार्यों में चतुर है। वह कुछ उपाय कर सकता है ॥१३५॥ ऐसा सोचकर वह भिक्षुकी नापित के पास गई और उसे अपना सर्वकार्य करानेवाली सारी योजनाएँ बताई ॥१३६॥ तब वह वृद्ध और धूर्त नापित सोचने लगा- 'मेरे भाग्य से ही लाभ का यह अवसर मिला है ॥१३७॥ इसलिए नई राजवधू को मारना न चाहिए प्रत्युत इसकी रक्षा करनी चाहिए क्योंकि इस रानी का पिता दिव्य दृष्टिवाला है। वह योगबल से सब जानकर प्रकट कर देगा ॥१३८॥ इस समय तो उसे राजा से पृथक् करके महारानी का धन पाते हैं, क्योंकि रहस्य में सहायता करनेवाले सेवक के सामने स्वामी स्वयं सेवक बन जाता है ॥१३९॥ राजा और नई रानी दोनों को अलग-अलग कराकर यथासमय राजा को ऐसा समझा दूँगा कि जिससे राजा और महिष्या दोनों ही सदा के लिए मेरी जीविका के स्रोत बन जायेंगे। इस प्रकार, भारी पाप भी न होगा और मेरे लिए स्थायी जीविका भी बन जायगी ऐसा सोचकर वह मूर्ख नापित उस कपटी तपस्विनी से कहने लगा - 'माता मैं यह सब तो कर दूँगा किन्तु किसी उपाय से यदि राजा की नई रानी को मार दिया जाय तो यह उचित न होगा ॥१४०-१४२॥ रहस्य फूट पड़ने पर, राजा हमलोगों को फाँसी दे सकता है। स्त्री-हत्या करना पाप भी होगा और रानी का पिता मुनि भी हमें शाप देगा ॥१४३॥ इसलिए केवल बुद्धि के बल से ही उसे राजा से पृथक कर दिया जाय तो महारानी भी सुख से रहेगी और हमें भी धन मिलेगा ॥१४४॥ यह बात तो क्या है? बुद्धि से मैं क्या नहीं कर सकता। मेरी बुद्धि का वैभव सुनो मैं कहता हूँ ॥१४५॥ नाई और राजा की कथा इस राजा दृढ़वर्मा का पिता बहुत ही दुश्चरित्र था। मैं उसका दास था और उसका क्षौर कर्म किया करता था ॥१४६॥ किसी समय इधर-उधर घूमते हुए उसने मेरी पत्नी को देख लिया। उस सुन्दरी युवती की ओर उसका मन खिंच गया ॥१४७॥ ९३