कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextराजा ने इस बात को जानने के लिए, बनिये को वहीं बुलवाया तो बनिये ने राजा से कहा—'महाराज ! मेरे पास इसका कुछ भी नहीं है' ॥७३॥ तब उपकोशा ने कहा—'महाराज ! इसके साक्षी मेरे गृह के देवता हैं, जिन्हें मेरे पति सन्दूक में बन्द कर गये हैं ॥७४॥ इस बनिये ने उन देवताओं के आगे अपने मुंह से धन स्वीकार किया है। आप उस सन्दूक को मंगाकर उन देवताओं से पूछिए' ॥७५॥ ऐसा सुनकर राजा को आश्चर्य हुआ और उसने सन्दूक लाने की आज्ञा दी और कुछ ही समय में बहुत व्यक्ति मिलकर उस सन्दूक को राजा के सामने ले आये ॥७६॥ सन्दूक आ जाने पर उपकोशा ने कहा—हे देवताओ ! सच बोलो। जो इस बनिये ने कहा है—बताओ और फिर घर को जाओ ॥७७॥ 'यदि तुम न बोलोगे तो तुम्हें सन्दूक के साथ ही जला दूँगी या राजसभा में सन्दूक खोल- कर तुम्हारा प्रदर्शन करूंगी। यह सुनकर सन्दूक के अन्दर से वे लोग भयभीत होकर बोले ॥७८॥ 'सच है, इसने हम लोगों के सामने धन स्वीकार किया है। तब बनिये ने निरुत्तर होकर उसका धन स्वीकार किया ॥७९॥ इसके अनन्तर अत्यन्त कुतूहलवश राजा के साग्रह प्रार्थना करने पर उपकोशा ने अर्गला तोड़कर उस सभा में सन्दूक खोल दिया ॥८०॥ सन्दूक खोलने पर अन्धकार के पिण्ड के समान वे तीनों पुरुष उसमें से निकले तो बड़ी कठिनता के साथ उन्हें राजा और मन्त्रियों ने पहचाना ॥८१॥ उन्हें देख सभी सभासदों के हँसने पर राजा ने आश्चर्य के साथ उपकोशा से पूछा कि 'यह क्या है ? तब उपकोशा ने सारा वृत्तान्त सभा में सुना दिया ॥८२॥ 'चरित्र की रक्षा करनेवाली कुलीन स्त्रियों के चरित्र अचिन्तनीय होते हैं। इस प्रकार सभी सभासद, उपकोशा के चरित्र की प्रशंसा करने लगे ॥८३॥ राजा ने समस्त वृत्तान्त सुनकर परदाराभिलाषी उन तीनों की सम्पत्ति का हरण करके उन्हें देश से निकाल दिया। सच है दुश्चरित्र किसके लिए कल्याणकारक होता है ॥८४॥ 'तू मेरी बहिन है—ऐसा कहकर तथा प्रसन्नता के साथ बहुत-सा धन देकर राजा ने उपकोशा को वापस भेज दिया। वह अपने घर आ गई ॥८५॥ वर्ष और उपवर्ष भी इस समाचार को जानकर उस पतिव्रता स्त्री का अभिनन्दन करने लगे और सभी नगर-निवासी इस समाचार से आश्चर्यचकित हो मुस्कराने लगे ॥८६॥ इसी बीच मैंने हिमालय में कठोर तपस्या करके वरदानी महादेव की आराधना की ॥८७॥