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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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उन दोनों ने उस धन को लेकर और कुछ भाग उसे देकर, कुछ गुंडों को उभाड़ा और उस धन को भी लेने की इच्छा से उसके हाथ-पैर कटवा दिये ॥४८॥ इतने अत्याचार करने पर भी वह अपने बड़े भाइयों पर क्रुद्ध नहीं हुआ। फलतः इस सत्य वाक्य के प्रभाव से उसके हाथ-पैर ठीक हो गये ॥४९॥ उसे देखकर तब से मैंने सारा क्रोध छोड़ दिया। पर तुमने तपस्वी होकर भी अभी तक क्रोध नहीं छोड़ा ॥५०॥ इस प्रभाव के कारण ही मैंने स्वयं पर विजय पाई है। अभी देखो'—ऐसा कहकर वह विप्र अपना चोला (शरीर) त्यागकर उसी समय स्वर्ग को चला गया ॥५१॥ एक आश्चर्य तो मैंने यह देखा—'हे राजन् अब दूसरा सुनो—ऐसा कहकर वह ब्राह्मण राजा श्रुतसेन से यह कहने लगा ॥५२॥ वहाँ से मैं तीर्थयात्रा के लिए समुद्र-तट पर भ्रमण करते हुए राजा बसन्तसेन के राज्य में गया ॥५३॥

विद्युत्प्रभा और राजा श्रुतसेन की कथा (चालू)

वहाँ पर राजा के भोजन-क्षेत्र में प्रवेश करने पर ब्राह्मण लोग मुझसे कहने लगे— 'ब्राह्मण इस मार्ग से न जाओ। आगे मार्ग में राजा की कन्या बैठी है ॥५४॥ उसका नाम विद्युत्प्रभा है। उसे यदि कोई संयमी मुनि भी देख ले तो वह कामबाण से आहत होकर बच नहीं सकता' ॥५५॥ तब मैंने उन्हें कहा 'कि यह कोई आश्चर्य नहीं है। मैं दूसरे कामदेव के समान श्रुतसेन राजा को प्रतिदिन देखता हूँ। जिस राजा के बाहर निकलने पर सैनिक गण कुलस्त्रियों का उनका सती चरित्र भंग होने के भय से मार्ग से हटा देते हैं' ॥५६-५७॥ ऐसा कहते हुए मुझे आपका कृपापात्र समझकर सत्र के व्यवस्थापक और पुरोहित राजा के समीप ले गये ॥५८॥ वहाँ मैंने राजपुत्री विद्युत्प्रभा को देखा है। वह मानों काम की शरीरधारिणी जग मोहिनी पराविद्या है। उसके दर्शन से होनेवाले क्षोभ को बहुत विलम्ब के पश्चात् नियन्त्रित करके मैंने यह सोचा—'यदि यह हमारे स्वामी की पत्नी हो जाय तो वह सारा राज्यकार्य भूल जाय' ॥५९-६०॥ फिर भी मुझे यह समाचार तो प्रभु (आप) से कहना ही चाहिए अन्यथा देवसेन और उन्मादिनी की-सी गति हो जायगी ॥६१॥ ९५

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