कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७५७ मन्त्री यौगन्धरायण का राजनीतिक प्रपञ्च (चालू) अतः यदि तुमने कलिङ्गसेना का परिणय किया तो वासवदत्ता अवश्य प्राण-त्याग क्रमशः कर देगी इसमें संदेह नहीं ॥७६॥ रानी पद्मावती भी इसी प्रकार प्राण त्याग देगी क्योंकि दोनों एक प्राण हैं। ऐसी स्थिति में तुम्हारे पुत्र नरवाहनदत्त की क्या स्थिति होगी ? ॥७७॥ यह सब अनर्थ आपका हृदय सहन कर सकेगा या नहीं यह मैं नहीं जानता किन्तु यह सब एक बार में ही नष्ट हो जायगा ॥७८॥ दोनों रानियों की बातों में जो गम्भीरता है वह इस बात की ओर स्पष्ट इंगित करती है कि उनका जीवन प्राण-त्याग के दृढ़ निश्चय से निःस्पृह है। जो भी हो तुम्हें अपने स्वार्थ की रक्षा करनी चाहिए यह बात तो पशु-पक्षी भी जानते हैं फिर आपके ऐसे बुद्धिमानों की बात ही क्या है ॥७९-८०॥ मन्त्रिश्रेष्ठ यौगन्धरायण से इस प्रकार सुनकर भली भाँति विचार-विमर्श करके वत्सेश्वर ने कहा—॥८१॥ 'ठीक है इसमें सन्देह नहीं कि इस प्रकार मेरा सारा संसार ही नष्ट हो जायगा। इसलिए अब कलिङ्गसेना के परिणय से मेरा कोई प्रयोजन नहीं ॥८२॥ गणकों (ज्योतिषियों) ने भी लग्न का दूर समय देकर अच्छा ही किया। स्वयंवरा स्त्री का त्याग करने से ही इतना अभय होगा' ॥८३॥ वत्सराज के इस प्रकार कहने पर प्रसन्न हुए यौगन्धरायण ने सोचा कि कार्य तो जैसा हम चाहते थे वैसा सिद्ध हो गया। उपाय-रूपी जल से सींची हुई और देश-काल के अनुसार बढ़ी हुई नीति-रूपी यह लता समय पर फल क्यों न देगी ? ॥८४-८५॥ ऐसा सोचकर और देश-काल का ध्यान करता हुआ मन्त्री राजा को प्रणाम करता हुआ घर चला गया ॥८६॥ राजा भी कृत्रिम शिष्टाचार से अपने भाव को छिपाते हुए रानी वासवदत्ता को सान्त्वना देता हुआ कहने लगा—॥८७॥ 'हे मृगनयने मैं किसलिए कह रहा हूँ यह तुम जानती हो ? कमल के लिए जल के समान तुम्हारा प्रेम ही मेरा जीवन है ॥८८॥ मैं किसी दूसरी स्त्री का नाम लेने का भी साहस नहीं करता। किन्तु कलिङ्गसेना तो हठ- पूर्वक मेरे घर आ गई ॥८९॥