कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in context'नीति में बृहस्पति के सिवा तुम्हारे समान और कौन है। तुम्हारी सम्मति राज्य-रूपी वृक्ष के लिए अमृत-सिंचन के समान है' ॥१६३॥ अब मैं कलिङ्गसेना की गतिविधि का बुद्धि और शक्ति दोनों से ही जानने का प्रयत्न करूंगा। ऐसा कहकर योगेश्वर चला गया ॥१६४॥ उस समय अपने भवन में बैठी हुई कलिङ्गसेना राजमहल, उद्यान आदि में भ्रमण करते हुए वत्सराज को देख-देखकर तड़प रही थी ॥१६५॥ वत्सममय हृदयवाली कलिङ्गसेना मृणाल (कमलनाल) के अंगद (भुजा के आभूषण) से मनाहार लगा रही थी और चन्दन का लेप करने पर भी विरहाग्नि से शान्ति प्राप्त नहीं कर पा रही थी ॥१६६॥ इसी बीच मदनवेग नाम का वह विद्याधरों का राजा पहले से ही कलिङ्गसेना को देखकर कामबाणों की गम्भीर वेदना का अनुभव कर रहा था ॥१६७॥ उसकी प्राप्ति के लिए तप करके शिवजी से वर लाभ कर लेने पर भी दूसरे पर आसक्त और दूसरे वेश में गई हुई कलिङ्गसेना अब उसके लिए सहज में ही पान योग्य नहीं रह गई थी ॥१६८॥ इसीलिए अवसर की प्रतीक्षा में विद्याधरों का वह राजा रात्रियों में आकाश में विचरण करता हुआ एक बार कलिङ्गसेना के निवास भवन के ऊपर आया ॥१६९॥ और तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी के उस आदेश का स्मरण करके एक बार रात के समय अपनी विद्या के बल से वत्सराज का रूप और वेष बनाकर द्वारपाल से प्रणाम किया जाता हुआ कलिङ्गसेना के मन्दिर में गया। मानों मन्त्रियों द्वारा किए गए कालक्षेप को सहन न करके राजा गुप्त रूप में स्वयं ही आ गया हो ॥१७०-१७१॥ उसे देखकर कामव्यथा से व्याकुल कलिङ्गसेना उठी। उसके उठने पर झनझनाते उसके आभूषण मानों यह कह रहे थे कि यह वह (वत्सराज) नहीं है ॥१७२॥ तदनन्तर वत्सराज का रूप धारण किए हुए उस विद्याधर ने धीरे-धीरे उसे विश्वास दिलाकर गान्धर्व विधान से अपनी पत्नी बना लिया ॥१७३॥ उसी समय अन्दर घुसा हुआ और अपनी विद्या के प्रभाव से अलक्षित योगेश्वर वत्सराज को देखकर भ्रम से चकित रह गया ॥१७४॥ और, वत्सराज को यौगन्धरायण के पास बैठा हुआ देखकर उनके आदेश से उसे यह सब वृत्तान्त कहने के लिए उसके पास गया ॥१७५॥ मन्त्री के कहने से कलिङ्गसेना के गुप्त प्रेमी का वास्तविक रूप देखने के लिए वह पुनः लौट आया ॥१७६॥ और सोई हुई कलिङ्गसेना के पास आकर उस पर सोये हुए मदनवेग के वास्तविक रूप को उसने देखा ॥१७७॥ ९७