कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७७९ स्वच्छ लावण्यमय सुधा से सींची हुई आश्चर्यमय रूपराशि आभूषणों से अलंकृत और मन को आकृष्ट करनेवाली कामदेव की राजधानी के समान वह स्त्री थी। और, वह स्त्री 'तेरे द्वारा मैं विश्व-विजय करूँगा'—मानों इस प्रकार कामदेव के तरकश-रूपी दोनों पैरों (पिंडलियों) से युक्त थी ॥१४-१५॥ देखते ही उस स्त्री ने राजा के मन को ऐसा हर लिया कि विवश होकर वह राजा उसके घर का पता लगाकर रात में वहाँ गया ॥१६॥ प्रार्थना करते हुए राजा से उसने कहा—'तुम तो प्रजा के रक्षक हो। तुम्हें परस्त्री का धर्म नहीं बिगाड़ना चाहिए' ॥१७॥ यदि बलपूर्वक मुझे छुओगे तो तुम्हे पाप लगेगा। मैं भी तुरन्त मर जाऊँगी। इस कलंक को कदापि सहन न करूँगी ॥१८॥ ऐसा कहने पर भी राजा के बलात्कार करने की चेष्टा करने पर शील नाश होने के भय से उस वैश्य-वधू का हृदय तुरन्त फट गया। यह देखकर लज्जित राजा लौट गया और उसी पश्चाताप में वह भी मर गया ॥१९-२०॥ इस प्रकार इस कथा को कहकर भय और नम्रता से भरी हुई कलिङ्गसेना ने वत्गराज से कहा—'इसलिए मेरे प्राण हरण करनेवाले अधर्म में मन को न लगाओ। मैं तुम्हारी आश्रित हूँ। तुम मुझे यहाँ रहने दो अथवा मैं यहाँ से चली जाऊँ' ॥२१-२२॥ कलिङ्गसेना की ऐसी बातें सुनकर धर्मात्मा वत्गराज पापकर्म से विरत होकर उससे कहने लगा—'हे राजकुमारी तुम अपने पति के साथ अपनी इच्छा से यहाँ रहो। मैं तुम्हें कुछ न कहूँगा। अब भय न करो' ॥२३-२४॥ ऐसा कहकर राजा के अपने भवन में चले जाने पर, यह सब समाचार सुनकर मदनवेग आकाश से उतरा ॥२५॥ आकर अपनी पत्नी कलिङ्गसेना से बोला—'तूने बहुत अच्छा किया। यदि इससे अन्यथा करती तो मैं कदापि सहन न करता' ॥२६॥ ऐसा कहकर कलिङ्गसेना को धीरज बँधाकर और उसके साथ रात बिताकर मदनवेग उसी भवन में आना-जाना करने लगा ॥२७॥ वह कलिङ्गसेना भी अपने पति विद्याधरराज के साथ कनकप्रभनगर के भी दिव्य भोगों का उपभोग करती हुई वहाँ रहने लगी ॥२८॥