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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक ७८१ वत्सराज भी कलिङ्गसेना की चिन्ता छोड़कर मन्त्री यौगन्धरायण की बात सोचता हुआ यशरूपी राज्य और पुत्र को मानों पुनः प्राप्त कर प्रसन्न रहने लगा ॥२९॥ नीति-रूपी कल्पलता के फलने-पकने पर रानी वासवदत्ता और मन्त्री यौगन्धरायण भी निश्चिन्त हो गये ॥३०॥ मदनमञ्चुका के जन्म की कथा कुछ दिनों के व्यतीत होने पर कुछ पीले और पतले मुँहवाली तथा विविध प्रकार की इच्छाएँ रखनेवाली कलिङ्गसेना ने गर्भ धारण किया ॥३१॥ कालिमा लिये हुए उसके उत्तुंग स्तनों के अग्रभाग कामदेव की मद-मुद्रा से अंकित उसके कोष (खजाने) के घड़ों के समान सुशोभित हो रहे थे ॥३२॥ तब उसके पति मदनवेग ने एक बार उससे कहा—'हे कलिङ्गसेना दिव्य व्यक्तियों का यह नियम है कि मनुष्य-योनि में उत्पन्न अपने गर्भ को छोड़कर दूर चले जाते हैं। क्या मेनका ने कण्व के आश्रम में शकुन्तला को नहीं छोड़ दिया था ? ॥३३-३४॥ यद्यपि तू भी पूर्वजन्म की अप्सरा है किन्तु अपने ही अविनय (उद्दण्डता) के कारण इन्द्र के शाप से मानव-योनि को प्राप्त हुई है ॥३५॥ इसी कारण पतिव्रता होने पर भी तूने बन्धकी (व्यभिचारिणी) यह विशेषण प्राप्त किया। इसलिए तू अपनी सन्तान की रक्षा करना और मैं अपने स्थान को चला जाऊँगा ॥३६॥ जब तू मुझे स्मरण करेगी तभी तेरे समीप आ जाऊँगा। विद्याधर ने आँसू बहाती हुई कलिङ्गसेना से इस प्रकार कहा ॥३७॥ और, उसे धीरज बँधाकर तथा अच्छे-अच्छे रत्न उसे देकर, उसी में मन लगाया हुआ और समय हो जाने के कारण खिंचा हुआ विद्याधर-राज चला गया ॥३८॥ कलिङ्गसेना भी सखी के समान सन्तान की आशा को लिये हुए वत्सराज की छत्रछाया के सहारे वहीं रहने लगी ॥३९॥ इसी बीच कामदेव की पत्नी रति ने सम्पूर्ण शरीरयुक्त पति (कामदेव) की प्राप्ति के लिए शिवजी की तपस्या की और शिवजी ने उसे आज्ञा दी कि 'मेरे द्वारा पहले भस्म किया गया वह तेरा पति (कामदेव) वत्सराज के घर में उत्पन्न हुआ है। उसका नाम नरवाहनदत्त है। मेरे साथ उद्दण्डता करने के कारण वह देवता होकर भी योनिज है। उसी शापप्रथा के फलस्वरूप तू भी मर्त्यलोक में अयोनिज होकर सम्पूर्ण शरीरवाले पति से मिलेगी ॥४०-४२॥ रति से ऐसा कहकर शिवजी ने प्रजापति से कहा—'कलिङ्गसेना दिव्य वीर्य से उत्पन्न पुत्र का प्रसव करेगी ॥४३॥