कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ८१ तब नरवाहनदत्त उस दिन मन्दारगुच्छ के समान स्तनोंवाली शिरीष-सुमन के समान मुखमण्डल विकसित कमल के समान मुखवाली और प्रफुल्ल कुमुदों के समान नेत्रोंवाली दुपहरिया फूल की भाँति लाल होठों वाली मानों जगद्विजय के लिए निर्मित कामदेव के एक बाण के समान उस मदनमञ्चुका के साथ उद्यान में विहार करता रहा ॥२३ २३२॥ दूसरे दिन कलिङ्गसेना ने भी स्वयं वत्सराज के पास जाकर अपना अभिलषित प्रस्ताव निवेदित किया जो कन्या-विवाह के सम्बन्ध में था ॥२३३॥ वत्सराज ने भी कलिङ्गसेना को विदा करके अपने मन्त्रियों को बुलाकर रानी वासवदत्ता की उपस्थिति में उनसे कहा—॥२३४॥ 'कलिङ्गसेना कन्या के विवाह के लिए शीघ्रता कर रही है। अतः हम यह विवाह कैसे करें क्योंकि उस साध्वी को भी लोग व्यभिचारिणी कहते हैं ॥२३५॥ जनापवाद से तो सदा बचना ही चाहिए। प्राचीनकाल में श्रीरामचन्द्रजी ने जनापवाद के ही कारण क्या जानकी को नहीं त्याग दिया था ? ॥२३६॥ भीष्म ने अपने भाई के लिए अपहरण की गई पूर्व-विवाहित अम्बा को क्या नहीं छोड़ दिया था ? ॥२३७॥ इसी प्रकार कलिङ्गसेना स्वयंवर द्वारा मेरा वरण कर लेने पर भी मदनवेग से विवाहित हुई। यही कारण है कि लोग इसकी निन्दा करते हैं ॥२३८॥ इसलिए नरवाहनदत्त अपने अनुकर इसकी कन्या को गान्धर्व-विधि से विवाहित कर लेगा ॥२३९॥ वत्सराज के ऐसा कहने पर यौगन्धरायण ने कहा—'स्वामिन् ! यदि कलिङ्गसेना ऐसा चाहती है तो यह अनुचित कैसे हो सकता है ? वह साधारण नहीं दिव्य स्त्री है। इसलिए इसकी कन्या भी दिव्य है। यह बात मेरे मित्र ब्रह्मराक्षस ने मुझसे बार-बार कही है ॥२४ २४१॥ इस प्रकार जब वे परस्पर विचार कर ही रहे थे इतने ही में आकाश से दिव्यवाणी सुनाई पड़ी —॥२४२॥ 'मेरे नेत्रानल से दग्ध कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त के लिए मैंने ही कामदेव की भार्या रति के तप से सन्तुष्ट होकर इस मदनमंचुका की सृष्टि की है। यह नरवाहनदत्त की प्रधान महिषी होकर, मेरी कृपा से शत्रुओं को जीतकर दिव्य मलयपर्यन्त विद्याधरों की साम्राज्ञी बनी रहेगी इतना कहकर दिव्यवाणी मौन हो गई ॥२४३ २४५॥ ११