कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
DevanagariHindipublished876 pages
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षष्ठ लम्बक ८१५ इस नगरी के महोत्सव दिन प्रतिदन बढ़ने लगे और अनेक दिनों तक उत्सव निरन्तर चलते रहने पर समाप्त हुए। सभी कुटुम्बी और मित्र परस्पर प्रेम और आनन्दपूर्वक रहने लगे उनके मनोरथ सफल और पूर्ण हुए ॥२६४॥ विवाह के पश्चात् युवराज नरवाहनदत्त अभ्युदय की आशा रखता हुआ चिर अभि लषित सांसारिक भोगों को मदनमञ्चुका के साथ आनन्दपूर्वक भोगने लगा ॥२६५॥ आठवाँ तरंग समाप्त मदनमञ्चुका नामक छठा लम्बक भी समाप्त