कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextअष्टम लम्बक १८५ एक धूर्त और झूठे मन्त्री की कथा सुनो। दक्षिणापथ के एक नगर में पृथ्वीपति नाम का एक राजा था। उसके राष्ट्र में दूसरों को ठगने की जीविका करनेवाला कोई धूर्त रहता था। वह बहुत महत्त्वाकांक्षी होने के कारण एक बार असन्तुष्ट होकर सोचने लगा कि मेरी ऐसी धूर्तता से क्या लाभ कि जिससे केवल भोजन आदि का ही काम चल सके जिससे अधिक-से-अधिक धन न कमाया जाय ? ॥१११—११२॥ ऐसा सोचकर और बहुत उत्तम वणिक-वेष धारण करके वह धूर्त राजा के द्वार पर आकर द्वारपाल से मिला। उसके द्वारा अन्दर प्रवेश पाकर और राजा से भेंट करके वह बोला— 'महाराज मैं एकान्त में आपसे कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। उसके बहुमूल्य वेष से प्रभावित और भेंट से आकृष्ट राजा ने सबको हटाकर एकान्त किया। तब उस धूर्त ने राजा से इस प्रकार कहा ॥११३—११५॥ आप प्रतिदिन सभा में एकान्त करके एक क्षण के लिए गुप्त बातचीत किया कीजिए ॥११६॥ इसके लिए मैं आपको प्रतिदिन पाँच सौ दीनार भेंट किया करूँगा। बस इतनी ही प्रार्थना है। और कुछ नहीं' ॥११७॥ यह सुनकर उस राजा ने सोचा—'इसमें क्या हानि है? यह मेरा कुछ ले तो जायगा नहीं बल्कि प्रतिदिन पाँच सौ दीनार ही देगा ॥११८॥ इस बड़े धनी बनिये के साथ वार्तालाप करने में लाज भी क्या ? इसलिए राजा ने उसे स्वीकार कर वैसा ही करना प्रारम्भ कर दिया ॥११९॥ वह धूर्त भी अपने कथनानुसार पाँच सौ दीनार राजा को प्रति दिन देने लगा और राज्य के लोगों ने उसे राज्य के महामन्त्री पद पर प्रतिष्ठित समझ लिया ॥१२०॥ एक दिन उस धूर्त ने किसी अधिकारी की ओर भेद-भरी दृष्टि डालकर राजा से बातचीत करनी प्रारम्भ की ॥१२१॥ बाहर निकलने पर उस अधिकारी के उससे अपने मुंह की ओर देखने का कारण पूछा तो उसने उससे सरासर झूठी बातें कह दीं ॥१२२॥ 'इसने मेरे राज्य को लूट लिया यह समझकर राजा तुझ पर क्रुद्ध हैं। इसलिए मैंने तेरा मुंह देखा। अब मैं राजा को समझाकर शान्त कर दूंगा' ॥१२३॥ उस झूठे मन्त्री से इस प्रकार छले गये और डरे हुए अधिकारी ने उसके घर पर जाकर एक हजार दीनार उसे भेंट किये (घूस में दिये) ॥१२४॥ १२४