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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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एकादश लम्बक १ ११ विद्याधर ने प्राचीन समय में शिवजी के चरण के प्रप्रनाग से जो जाम का पौधा पाया था उस बालक पौधे को मैंने उससे ले लिया था। अच्छे-अच्छे रत्नों से भरे हुए इस पौधे का अब मैं तुम दम्पती को देती हूँ। इस प्रकार सपत्नीक मुझे कहकर यमुना भी चली गई ॥१७-१८॥ तदनन्तर, अपनी प्रेयसी पत्नी को पाकर और बनवास से ग्रस्त में वियोग के भय से अपने देश को जाने के लिए उत्सुक हुआ ॥१९॥ यात्रा के लिए उद्यत मैंने समुद्र-तट पर आकर किसी व्यापारी की नाव मिल जाने पर पहले अपनी पत्नी को उस पर चढ़ा दिया ॥२०॥ जब मैं उस पर चढ़ने के लिए उद्यत हुआ तब मुनि के शाप के प्रभाव से वायु ने मेरी नाव को किनारे से दूर कर दिया ॥२१॥ उस नाव द्वारा पत्नी का हरण हो जाने पर, मूर्च्छा ने भी अवसर देखकर मेरी चेतना का हरण कर लिया। अर्थात् मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥२२॥ तब वहाँ आया हुआ एक तपस्वी मूर्छित देखकर मुझे हाथ में उठाकर धीरज देकर अपने आश्रम में ले गया ॥२३॥ वहाँ ले जाकर उसने मेरा सारा समाचार सुनकर, इस शाप का प्रभाव समझकर और शाप की अवधि को जानकर भी उसने मुझे धैर्य बँधाया ॥२४॥ तब अपनी पत्नी को ढूँढ़ता हुआ मैं टूटी हुई नाव से बचकर निकले हुए अपने मित्र बेन्ध से मिला ॥२५॥ शाप से रूप की आशा में उसके जादुबल से उन उन बहुत-से दुर्गम देशों को लाँघता हुआ तुमसे मिलने के लिए विशालापुर आया तो ज्ञात हुआ कि वत्सराज के रूप के यात्री-स्वरूप गुप्त यहाँ आये हुए ॥२६-२७॥ जब दूर से मैंने हथिनी द्वारा ढोया पाहा का तुम्हारे द्वारा जीतते हुए देखा तब मैं जीवन पाकर ध्यान से मूर्च्छा हट गया और क्षण भर में ही मैंने उसी नाव से मक्षिका द्वारा लाई गई अपनी प्राणप्यारी को भी पाया ॥२८-२९॥ तब मैं यमुना के कल्याणमय शापा से राज्य को व उस बचा से मिला और तुम्हारी कृपा से शाप का कष्ट पार किया ॥३०॥ इसलिए हे वत्सराज के सचिव मुझे प्रणाम करने के लिए मैं यहाँ आया हूँ और अब बन्धों से मुक्त होकर अपनी विद्याधरों के साथ जा रहा हूँ ॥३१॥